देवदास कभी पुरानी न पड़ने वाली अमर कहानी है

शरत् बाबू के उपन्यासों में जिस रचना को सब से अधिक लोकप्रियता मिली है वह है देवदास। तालसोनापुर गाँव के देवदास और पार्वती बालपन से अभिन्न स्नेह सूत्रों में बँध जाते हैं, 

Posted 7 months ago in Movies & Animation.

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Poonam Namdev
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किन्तु देवदास की भीरू प्रवृत्ति और उसके माता-पिता के मिथ्या कुलाभिमान के कारण दोनों का विवाह नहीं हो पाता। दो तीन हजार रुपये मिलने की आशा में पार्वती के स्वार्थी पिता तेरह वर्षीय पार्वती को चालीस वर्षीय दुहाजू भुवन चौधरी के हाथ बेच देते हैं, जिसकी विवाहिता कन्या उम्र में पार्वती से बड़ी थी। विवाहोपरान्त पार्वती अपने पति और परिवार की पूर्णनिष्ठा व समर्पण के साथ देखभाल करती है। निष्फल प्रेम के कारण नैराश्य में डूबा देवदास मदिरा सेवन आरम्भ करता है,जिस कारण उसका स्वास्थ्य बहुत अधिक गिर जाता है। कोलकाता में चन्द्रमुखी वेश्या से देवदास के घनिष्ठ संबंध स्थापित होते हैं। देवदास के सम्पर्क में चन्द्रमुखी के अन्तर सत प्रवृत्तियाँ जाग्रत होती हैं। वह सदैव के लिए वेश्यावृत्ति का परित्याग कर अशथझूरी गाँव में रहकर समाजसेवा का व्रत लेती है। बीमारी के अन्तिम दिनों में देवदास पार्वती के ससुराल हाथीपोता पहुँचता है किन्तु देर रात होने के कारण उसके घर नहीं जाता। सवेरे तक उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। उसके अपरिचित शव को चाण्डाल जला देते हैं। देवदास के दुखद अन्त के बारे में सुनकर पार्वती बेहोश हो जाती है। देवदास में वंशगत भेदभाव एवं लड़की बेचने की कुप्रथा के साथ निष्फल प्रेम के करुण कहानी कही गयी है।वैशाख मास की दोपहरी की भीषण गरमी में पाठशाला के एक कमरे में फटी चटाई पर बैठकर ऊंघते और जम्हाई लेते देवदास ने कमरे में घुटते रहने की अपेक्षा खुले आसमान में पतंग उड़ाने का मज़ा लेने का निश्चय किया और फिर स्कूल से छुट्टी पाने का बहाना भी गढ़ लिया। इस समय पाठशाला में अर्धावकाश हुआ था। कुछ बच्चे अपनी-अपनी मण्डली बनाकर उछल-कूद और कोलाहल कर रहे थे, तो कुछ वृक्ष के नीचे गुल्ली डण्डा खेल रहे थे। देवदास को जलपान के लिए बाहर जाने की अनुमति देना बन्द कर दिया गया था; क्योंकि एक बाहर गया यह छोकरा वापस पाठशाला की ओर मुंह नहीं करता था। इसे गोविन्द पण्डित बहुत बार देख-परख चुके थे। देवदास के पिता ने भी अर्धावकाश में लड़के को बाहर न जाने के लिए अपनी सहमति दे रखी थी। इस अवधि में देवदास को अपनी कक्षा के मॉनीटर भोला की देख-रेख में रहना पड़ता हाथ में स्लेट लेकर उठ खड़े हुए देवदास ने देखा कि उस कमरे में उसके अध्यापक महोदय ऊंघ रहे हैं और मॉनीटर भोला दूर किसी टूटी-फूटी बैंच पर अन्य अध्यापक की भूमिका निभा रहा है। वह कभी अनमने भाव से बाहर खेलते लड़कों को देखता और कभी अपनी उड़ती निगाह देवदास और पार्वती पर डालता था। पार्वती एक महीना पहले ही पण्डितजी के आश्रय में रहने और शिक्षा ग्रहण करने आयी है। पण्डितजी से प्रभावित होने के कारण ही वह इस समय ‘बोधोदय’ पाठ्यपुस्तक के अन्तिम ख़ाली पृष्ठ पर स्याही से, मज़े से सो रहे पण्डितजी का चित्र बना रही थी और एक कुशल चित्रकार की भाँति रह-रहकर इस तथ्य की जांच कर रही थी कि वह अपने प्रयास में कितनी सफल रही है। यद्यपि वह अपने मनमाफिक चित्र नहीं बना पायी थी, तथापि जैसा बन पड़ा था, उसे ही देख-देखकर वह काफी प्रसन्न हो रही थी।।

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