नैनो टेक्नोलॉजी: बदल जाएगी आपकी जिंदगी

आज से 50 साल पहले के इतिहास पर नजर डालिए, तकनीकी मामले में आपको बहुत कुछ नहीं मिलेगा जो आज के विज्ञान ने दिया है.

Posted 4 months ago in Science and Technology.

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Raj Singh
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आज से 50 साल पहले के इतिहास पर नजर डालिए, तकनीकी मामले में आपको बहुत कुछ नहीं मिलेगा जो आज के विज्ञान ने दिया है.

उस समय विशाल मशीनें ज़रूर हुआ करती थीं… जितनी बड़ी मशीन उतना ही बड़ा उसका दाम भी हुआ करता था. हालांकि बदलते वक़्त के साथ यह दोनों ही कम होते गए.

आज दिन प्रतिदिन होती तरक्की से तकनीकें अपने बृहद रूप से छोटे या कहें ‘नैनो’ रूप में आ रही हैं.

नैनो टेक्नोलॉजी के उदाहरण के तौर पर कंप्यूटर को ही ले लीजिए. शुरूआती दिनों में कंप्यूटर बहुत ही बड़े हुआ करते थे. जैसे-जैसे वक़्त बदला इसका आकार कम होता गया.

आज के समय में तो कंप्यूटर वाला काम हम छोटे से गैजेट में ही कर सकते हैं. इस नैनो टेक्नोलॉजी के कारण ही आज लोगों की जिंदगी इतनी आसान हो पाई है.

अप्लाइड सांइस के इस हिस्से में 100 नैानेमीटर से भी छोटे उपकरणों या तत्व का अध्ययन किया जाता है.

आज विज्ञान के इस क्षेत्र में हुई उन्नति से इंसानों के लिए जीवन को व्यवस्थित कर पाना कहीं न कहीं आसान हुआ है.

तो चलिये मानवीय जीवन को आसान बनाने वाली इस तकनीक के बारे में और समझते हैं–

क्या है नैनो तकनीक?

नैनो शब्द ग्रीक भाषा से आया है जिसका अर्थ होता है बौना या छोटा!

यह विज्ञान की वह शाखा है जिसमें सूक्ष्मतम कणों का अध्ययन किया जाता है.

आपने अपने स्कूल के दिनों में ये अवश्य पढ़ा होगा कि यह ब्रह्माण्ड छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है, यहां तक कि हमारा शरीर भी.

नैनो तकनीक में अणुओं और परमाणुओं पर अध्ययन किया जाता है और ये रासायनिक विज्ञान, भौतिकी, बायो-तकनीक जैसे विषयों पर अधारित होती है.

नैनो तकनीक विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक का मिश्रण है, जिसमें पदार्थ के सूक्ष्म कणों, जिनका आकार 1-100  नैनोमीटर तक होता है, का अध्ययन किया जाता है. यह कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि हम उन्हें अपनी आँखों से कभी नहीं देख सकते.
नैनो तकनीक का ‘इतिहास’

नैनो-तकनीक को अच्छे से समझने के लिए हमें पहले इसके इतिहास को जानना होगा.

नैनो-तकनीक का उपयोग पुराने समय के कारीगरों की कृतियों में नजर आता है, जिसकी शुरूआत चौथी सदी में हुई थी.

इसके कुछ उदाहरण रोमन Lycurgus Cup के रूप में मिलते हैं, जिसमें सोने-चांदी के कणों के मिश्रण का बारीक रूप में इस्तेमाल किया गया है.

इस बर्तन की खास बात यह है कि जब इस पर बाहर से रोशनी डाली जाती है तो यह हरे रंग का दिखाई देता है और जब इसके अंदर से रोशनी गुजरती है तो यह लाल रंग का दिखाई देता है.

इसके अलावा 6वीं से 15वीं सदी के दौरान बनने वाली चमकीली और अद्धभुत कांच की खिड़कियां जो यूरोपियन गिरजाघरों में लगाई जाती थीं. ये भी गोल्ड क्लोराइड और अन्य धातुओं के ऑक्साइड्स नैनोपार्टिकल्स से मिलकर बनती थीं. इनकी विशेषता यह थी कि यह भी सूरज की रोशनी से चमक उठती थीं.

इतिहास में इस प्रकार की कई चीजें हैं जो आज के समय में नैनो तकनीक का स्पष्ट उदाहरण है.

समय बीतता गया और इंसान नैनो तकनीक से अंजान इस तरह की अद्भुत और नायाब चीजों का निर्माण करता रहा.

हालांकि विज्ञान लगातार तरक्की कर रहा था, इसलिए 19वीं शताब्दी में माइकल फैराडे ने अपनी मेहनत के बल पर नैनो तकनीक को दुनिया के सामने पेश किया.

इस तकनीक के बारे में पूरी जानकारी 29 दिसंबर 1959 को रिचर्ड फेयनमं द्वारा कैलिफ़ोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में दिए गए एक लेक्चर के दौरान मिली.

तब से लेकर आज तक नैनो तकनीक पर लगातार अनुसंधान जारी हैं.

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