बाबा साहब भीम राव आंबेडकर क्यों नहीं कहते थे गांधी को महात्मा

आंबेडकर: मैं 1929 में पहली बार गांधी से मिला था, एक मित्र के माध्यम से, एक कॉमन दोस्त थे, जिन्होंने गांधी को मुझसे मिलने को कहा. गांधी ने मुझे ख़त लिखा कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं. इसलिए मैं उनके पास गया और उनसे मिला, ये गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाने से ठीक पहले की बात है.

फिर वह दूसरे द

Posted 6 months ago in History and Facts.

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lakhan sharma
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.सवाल: क्या गांधी में धीरज नहीं था, या कांग्रेस पार्टी में?

आंबेडकरः मुझे नहीं मालूम कि अचानक एटली आज़ादी देने के लिए तैयार क्यों हो गए. ये एक गोपनीय विषय है, जो मुझे लगता है, कि एटली किसी दिन अपनी जीवनी में दुनिया के सामने लाएंगे. वो उस मुक़ाम तक कैसे पहुंचे. किसी ने अचानक इस बदलाव के बारे में नहीं सोचा था. किसी ने उम्मीद नहीं की थी.

ये मुझे अपने आकलन से लगता है. मुझे लगता है कि लेबर पार्टी ने दो कारणों से ये फ़ैसला किया. पहला है सुभाष चन्द्र बोस की राष्ट्रीय सेना. इस देश पर राज कर रहे ब्रिटिश को पूरा भरोसा था कि देश को चाहे कुछ भी हो जाए और राजनीतिज्ञ चाहे कुछ भी कर लें, लेकिन इस मिट्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं बदलेंगे.

इस सोच के साथ वो अपना प्रशासन चला रहे थे. उस सोच को बुरी तरह धक्का पहुंचा, जब उन्हें पता चला कि सैनिक एक पार्टी या बटालियन बना रहे हैं, जो ब्रिटिश को उखाड़ फेंकेगी. मुझे लगता है कि ऐसे में ब्रिटिश इस नतीजे पर पहुंचे, कि अगर उन्हें भारत पर शासन करना है तो इसका इकलौता आधार ब्रिटिश सेना से संचालन हो सकता है.

1857 की बात करें, जब भारतीय सैनिकों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था. उन्होंने पाया कि ब्रिटिश के लिए ये संभव नहीं होगा कि वो भारत में लगातार इतनी यूरोपीय सेना मुहैया कराते रहें, जिसके ज़रिये शासन किया जा सके.

दूसरी बात, जो मुझे लगती है, हालांकि मेरे पास ऐसा सबूत नहीं है, लेकिन मैं सोचता हूं कि ब्रिटिश सैनिक सेना को फ़ौरन समाप्त करना चाहते थे, ताकि वो नागरिक पेशे अपना सकें. आप जानते हैं कि सेना को धीरे-धीरे कम करने के पीछे कितनी नाराज़गी थी?

क्योंकि जिन्हें सेना से नहीं निकाला गया था, वो सोचते थे, कि जिन लोगों को सेना से निकाल दिया गया है, वो उनका नागरिक पेशा हथिया रहे हैं और उनके साथ कितनी नाइंसाफ़ी हो रही है. लिहाज़ा भारत पर शासन करने के लिए पर्याप्त ब्रिटिश सेना रखना उनके लिए मुमकिन नहीं था.

तीसरी बात, मुझे लगता है कि इसके अलावा उन्होंने सोचा कि भारत से उन्हें सिर्फ़ वाणिज्य चाहिए था और सिविल सर्वेंट की पगार या सेना की आमदनी नहीं. ये तुच्छ चीज़ें थीं. व्यापार और वाणिज्य के रूप में इनका बलिदान करने में कोई हर्जा नहीं था. भारत आज़ाद हो जाए या उसकी स्थिति स्वीकृत डोमेन या उससे कमतर हो.

लेकिन व्यापार और वाणिज्य बना रहना चाहिए. मैं इसके बारे में सुनिश्चित नहीं हूं, लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है, लेबर पार्टी की मंशा यही रही होगी.

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