मुंबई अंडरवर्ल्ड के पहले डॉन हाजी मस्तान।

बाहुबलीः जानिए मुंबई अंडरवर्ल्ड के पहले डॉन हाजी मस्तान की अनसुनी दास्तान

मायानगरी मुंबई और अंडरवर्ल्ड का पुराना नाता है. सपनों के इस शहर की चकाचौंध के बीच जुर्म की अंधेरी गलियों में कई ऐसे माफिया डॉन वजूद में आए, जिन्होंने मुंबई ही नहीं बल्कि देश की सरहदों से बाहर निकलकर विदेशों तक अपने आतंक

Posted 4 months ago in People and Nations.

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Ashish upadhyay
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का सिक्का चलाया. ऐसा ही एक नाम था बाहुबली माफिया तस्कर हाजी मस्तान का. जो मुंबई का पहला अंडरवर्ल्ड डॉन कहलाया।
मुंबई में कई माफिया डॉन वजूद में आए, लेकिन एक नाम ऐसा भी है जिसने मुंबई अंडरवर्ल्ड को एक नई पहचान दी और ग्लैमर को अंडरवर्ल्ड के साथ लाकर खड़ा कर दिया. वो नाम था बाहुबली माफिया तस्कर हाजी मस्तान का. जो मुंबई का पहला अंडरवर्ल्ड डॉन कहलाया।

कौन था हाजी मस्तान

हाजी मस्तान मिर्जा का जन्म तमिलनाडु के कुड्डलोर में 1 मार्च 1926 को हुआ था. उसके पिता हैदर मिर्जा एक गरीब किसान थे. उनका परिवार आर्थिक रूप से काफी कमजोर था. कई बार घर में खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसी परेशानी में हैदर नए काम के लिए शहर जाना चाहते थे. लेकिन घर की परेशानी की वजह से वो घर नहीं छोड़ पाते थे।

1934 में मुंबई आया मिर्जा परिवार

हैदर मिर्जा के घर में हालात बहुत खराब थे. दो दिन तक घर में खाना नहीं बना था. तब हैदर मिर्जा ने आखिरकार बाहर जाकर पैसा कमाने का मन बनाया. 1934 में वह अपने बेटे मस्तान मिर्जा को साथ लेकर मुंबई आ गए. वहां उन्होंने कई काम किए मगर कामयाबी नहीं मिली. उसके बाद उन्होंने क्रॉफर्ड मार्केट के पास बंगाली टोला में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोली. दुकान खोले काफी वक्त बीत चुका था लेकिन कोई खास कमाई नहीं हो रही थी. दुकान पर खाली बैठा 8 साल का मस्तान सड़क से आने जाने वाली शानदार गाड़ियों और आलीशान इमारतों को देखता रहता था. वहीं से उसने उन गाड़ियों और बंगलों को अपना बनाने का सपना संजोया था।

 इस अंडरवर्ल्ड डॉन के नाम से आज भी कांपता है बॉलीवुड

डॉक पर मिला कुली का काम

मुंबई आए हुए उन्हें दस साल बीत चुके थे. हालात अभी भी पहले से बेहतर नहीं थे. इसी बीच मस्तान की मुलाकात मुंबई में ग़ालिब शेख नाम के एक शख्स से हुई. उसे एक तेजतर्रार लड़के की ज़रूरत थी. उसने मस्तान को बताया कि अगर वह डॉक पर कुली बन जाए तो वह अपने कपड़ों और थैले में कुछ खास सामान छिपाकर आसानी से बाहर ला सकता है. जिसके बदले उसे पैसा मिलेगा. इसके बाद मस्तान ने 1944 में डॉक में कुली के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. वह मन लगाकर काम करने लगा था. इस दौरान वहां डॉक पर काम करने वालों से मस्तान ने दोस्ती करना शुरू कर दिया. वो वहां आने जाने वालों से भी दुआ सलाम करने लगा था।

जुर्म की दुनिया में पहला कदम

दरअसल, चालीस के दशक में विदेश से जो लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान, महंगी घड़ियां या सोना, चांदी और गहने लेकर आते थे. उन्हें उस सामान पर टैक्स की शक्ल में बड़ी रकम अदा करनी पड़ती थी. यही वजह थी कि डॉक पर तस्करी करना एक फायदे का सौदा था. गालिब की बात मस्तान की समझ में आ चुकी थी. उसने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया. और गुपचुप तरीके से वह तस्करों की मदद करने लगा. तस्कर विदेशों से सोने के बिस्किट और अन्य सामान लाकर मस्तान को देते थे और वह उसे अपने कपड़ों और थैले में छिपाकर डॉक से बाहर ले जाता था. कुली होने के नाते कोई उस पर शक भी नहीं करता था. इस काम की एवज में मस्तान को अच्छा पैसा मिलने लगा था।

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तस्कर बन गया था मस्तान

डॉक पर काम काम करते करते मस्तान की जिंदगी बेहतर होने लगी थी. तस्करों की मदद करने से उसे खासा फायदा हो रहा था. 1950 का दशक मस्तान मिर्जा के लिए मिल का पत्थर साबित हुआ. 1956 में दमन और गुजरात का कुख्यात तस्कर सुकुर नारायण बखिया उसके संपर्क में आ गया. दोनों के बीच दोस्ती हो गई. दोनों साथ मिलकर काम करने लगे. उस वक्त सोने के बिस्किट, फिलिप्स के ट्रांजिस्टर और ब्रांडेड घड़ियों की बहुत मांग थी. मगर टैक्स की वजह से भारत में इस तरह का सामान लाना बहुत महंगा पड़ता था. लिहाजा दोनों ने मिलकर दुबई और एडेन इस सामान की तस्करी शुरू की. जिसमें दोनों को खासा मुनाफा हो रहा था. दोनों का काम बढ़ता गया और मस्तान की जिंदगी भी अब बदल चुकी थी. मामूली सा कुली मस्तान अब बाहुबली माफिया मस्तान भाई बन चुका था।

जुर्म का दुनिया का बड़ा नाम
यूं तो पहले मुंबई में वरदराजन मुदलियार उर्फ़ वर्धा का नाम चलता था. लेकिन वह माफिया डॉन जैसी छवि नहीं बना पाया था. कुछ समय बाद वर्धा वापस चेन्नई चला गया. अब मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया में सिर्फ एक नाम था मस्तान भाई यानी हाजी मस्तान. 1970 का दशक आते-आते मस्तान मुंबई में अपनी अलग पैठ बना चुका था. उसने दस साल के भीरत मुंबई में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया था. समुंद्र में उसका राज चलने लगा था. मस्तान जैसा बनना चाहता था, वह उससे ज्यादा ही बन गया था. अब वो अमीर भी था और ताकतवर भी. उसे सफेद डिजाइनर सूट पहनने और मर्सिडीज की सवारी करने का बहुत शौक था. उसके हाथ में हमेशा विदेशी सिगरेट और सिगार दिखाई देते थे. ऐशोआराम उसकी जिंदगी का शगल बन गया था।

बॉलीवुड से था लगाव
मुंबई अंडरवर्ल्ड के राजा कहे जाने वाले हाजी मस्तान मिर्जा का बॉलीवुड से बेहद लगाव था. मुंबई के पुराने लोग बताते हैं कि हाजी मस्तान बॉलीवुड अभिनेत्री मधुबाला का दिवाना था. वह उससे शादी करना चाहता था. मगर हालात के चलते ऐसा नहीं हो सका. फिर मधुबाला जैसी दिखने वाली फिल्म अभिनेत्री सोना मस्तान को भा गई और उसी के साथ मस्तान ने शादी की. मस्तान ने सोना के लिए कई फिल्मों में पैसा लगाया. लेकिन उनकी फिल्में नहीं चल सकी. बताते हैं कि दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, राज कपूर, धमेंद्र, फिरोज खान और संजीव कुमार जैसे बॉलीवुड सितारों से हाजी मस्तान की दोस्ती थी. कई बड़ी बॉलीवुड हस्तियां अक्सर उनके बंगले पर दिखाई देती थी.

पहली गिरफ्तारी और पुलिस नतमस्तक
मुबंई में हाजी मस्तान मिर्जा का नाम इतना बड़ा बन चुका था कि पुलिस और कानून उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था. 1974 में जब पुलिस ने पहली बार हाजी मस्तान को गिरफ्तार किया तो उसे एक वीआईपी की तरह तमाम सुविधाएं दी गई थी. उसे हवालात में न रखकर एक बंगले में नजरबंद रखा गया था. खाने के लिए बेहतरीन इंतजाम किए गए थे. उसकी खातिरदारी के लिए हर उस ज़रूरत का ख्याल रखा गया था, जिसकी मस्तान को चाह थी. पुलिस वाले भी उसे सलाम करते थे. मस्तान भी पुलिस वालों के काम आता था. उन्हें महंगे उपहार देना उसकी आदत में शामिल था. और अगर कोई अफसर उसका कहा नहीं मानता था तो वह उसका तबादला करा देता था.

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इंदिरा गांधी ने भेजा था जेल
देश में आपातकाल लगने से पहले की बात है. देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी मस्तान की ख़बरें मिलती रहती थी. मस्तान के बढ़ते प्रभाव से इंदिरा भी परेशान थीं. उनके आदेश पर मस्तान मिर्जा को उस वक्त पुलिस ने गिरफ्तार करने की कोशिश की मगर वो पकड़ में नहीं आया. लेकिन आपातकाल लगने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया. और यह पहला मौका था जब हाजी मस्तान को बाकायदा जेल जाना पड़ा था. बस यहीं से मस्तान की जिंदगी बदलने वाली थी. जेल में मस्तान की मुलाकात जेपी से हुई. उनके संपर्क में आने के बाद मस्तान पर खासा प्रभाव पड़ा. जब 18 महीने जेल में रहने के बाद हाजी मस्तान बाहर आया तो उसके इरादे बदल चुके थे. उसने जुर्म की दुनिया को अलविदा कहने का मन बना लिया था.

इंदिरा को ऑफर की थी बड़ी रकम
आपातकाल के दौरान जेल जाने के कुछ दिन बाद ही हाजी मस्तान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी रिहाई के लिए बड़ी रकम ऑफर की थी. लेकिन इंदिरा ने उसके ऑफर को ठुकरा दिया था. आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो हाजी मस्तान सहित करीब चालीस बड़े तस्करों को माफी मिल गई थी. दरअसल, इमरजेंसी लगने से पहले मस्तान ने कई नेताओं को पुलिस से बचाने और भागने में मदद की थी. इसलिए जनता पार्टी की सरकार ने उसके प्रति नरम रवैया अपनाया था।


राजनीति में एंट्री
आखिरकार, 1980 में हाजी मस्तान ने जरायम की दुनिया को अलविदा कहकर राजनीति का रुख कर लिया. 1984 में महाराष्ट्र के दलित नेता जोगिन्दर कावड़े के साथ मिलकर खुद की पार्टी दलित-मुस्लिम सुरक्षा महासंघ बनाई. आगे चलकर 1990 में इसका नाम बदल कर भारतीय अल्पसंख्यक महासंघ कर दिया गया था. बॉलीवुड के सुपर स्टॉर दिलीप कुमार ने इस सियासी पार्टी का खूब प्रचार किया. वे पार्टी के कई कार्यक्रमों में दिखाई देते थे. हाजी मस्तान की इस पार्टी ने बाद में मुंबई, कोलकाता और मद्रास के निकाय चुनाव में भागीदारी की. बताया जाता है कि चुनाव में भले ही पार्टी को कामयाबी नहीं मिली लेकिन इस चुनाव में काले धन का जमकर इस्तेमाल हुआ था. वहीं से चुनाव में भारी पैसा खर्च करने का शगल शुरू हुआ था.

न चलाई गोली, न ली किसी जान
हाजी मस्तान मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे ताकतवर डॉन था. लेकिन इस शक्तशाली डॉन ने अपनी पूरी जिंदगी में किसी की जान नहीं ली. किसी पर हमला नहीं किया. यहां तक कि एक भी गोली नहीं चलाई. बावजूद इसके हाजी मस्तान जुर्म की काली दुनिया में सबसे बड़ा नाम था. उस दौर में उसके नाम की तूती मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र में बोलती थी. हाजी मस्तान जिंदगीभर मुंबई में लोगों की मदद भी करता रहा. उसने अपना आखरी वक्त अपने परिवार के साथ बिताया जिसमें पत्नी और उसका गोद लिया बेटा शामिल था. और 1994 में हार्ट अटैक से हाजी मस्तान की मौत हो गई थी. आज भी मुंबई में उसके किस्से सुनने को मिल जाते हैं।

शुरुआती सफर
तमिलनाडु का रहने वाला मस्तान आठ साल की उम्र में मुंबई पहुंचा था. पहले साइकिल की दुकान खोली और फिर डॉक पर कुली बन गया. यहां उसकी दोस्ती एक अरब से हुई जो तस्कर था. एक मामले में वो जेल चला गया. जब वो जेल से लौटा तो मस्तान ने उसकी पेटी खोली तक नहीं थी. इस पेटी में सोना भरा था. इसमें से आधा सोना उसने मस्तान को दे दिया और अपने धंधे में शामिल कर लिया. इसके बाद तो मस्तान की जिंदगी ही बदल गई. तस्करी की इस राह पर चल कर वो अमीरी की ऊंचाइयों तक पहुंच गया.

दूसरों से कराता था काम
कहा जाता है कि मस्तान डॉन जरूर था लेकिन उसने कभी गोली नहीं चलाई और ना ही किसी की जान ली. ऐसा नहीं था कि वो अहिंसावादी था लेकिन वो खुद ये सब नहीं करना चाहता था. डॉक पर उसका एकछत्र राज चलता था और कुली भी उसे बहुत मानते थे. सभी लोग उसके लिए काम करने को तत्पर रहते थे. कहा जाता है कि पुलिसवालों और बाकी अधिकारियों को वह खूब तोहफे देता था और उनका जमीर इन्हीं तोहफों के बोझ तले दब जाता था. एक वक्त था जब वर्दराजन मुदालियार, करीम लाला, पठान गैंग और दाऊद गैंग सभी उसकी सरपरस्ती में थे।


मधुबाला से मुहब्बत
मस्तान मिर्जा उर्फ हाजी मस्तान फिल्मों का बहुत बड़ा शौकीन था और फिल्म अभिनेत्री मधुबाला को बहुत पसंद करता था. कहा तो ये भी जाता है कि वो उनसे मुहब्बत करता था. यकीनन ये पसंद एकतरफा थी. मस्तान को मधुबाला तो नहीं मिलीं लेकिन एक स्ट्रगल कर रही अभिनेत्री सोना मिल गईं. सोना की शक्ल बहुत हद तक मधुबाला से मिलती थी और शायद यही वजह थी कि मस्तान के जीवन में उनकी एंट्री हुई.

फिल्मों के दीवाने
राज कपूर, दिलीप कुमार और संजीव कुमार के साथ उनकी खासी मेल मुलाकात थी. कहा तो ये भी जाता है कि दीवार के रोल को सही से निभाने की चाहत में अमिताभ बच्चन भी उसके घर जाते थे. सोना और मस्तान ने कई फिल्मों में पैसा लगाया लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन बाद के दिनों में बदनामी का खौफ इतना था कि फिल्मी दुनिया से इतनी नजदीकियां होने के बाद भी उसकी मौत पर सिवाय मुकरी के कोई फिल्मी हस्ती नहीं पहुंची.

इंदिरा तक थी धमक की गूंज
एक वक्त था जब मस्तान का रुआब अपने चरम पर था और पूरे महाराष्ट्र में उसका जलवा था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी तक उसकी धमक की गूंज थी. जब आपातकाल लगा तो इंदिरा के आदेश पर कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. मस्तान भी उन्हीं में से एक था. जेल में उसकी मुलाकात जेपी से हुई. इसी मुलाकात ने मस्तान की जिंदगी बदल दी. उसने राजनीति में आने का मन बना लिया और एक पार्टी बना कर मैदान में उतर आया. दिलीप कुमार ने इस पार्टी का खूब प्रचार भी किया. उसका इरादा दलित, मुस्लिम वोट के सहारे सत्ता हासिल करना था लेकिन ऐसा हो ना सका. मस्तान ने वीपी सिंह का प्रचार भी किया था और कांशीराम, वीपी की तरह ही वह भी राजनीति में आगे बढ़ना चाहता था. वह खुद को 'बाबा साहेब' कहलवाना पसंद करता था.

डूबने लगा जब सूरज
एक वक्त आया जब वह तस्करी छोड़ रहा था और साथ ही माफियागिरी से भी पीछे हट रहा था. ये वो वक्त था जब वर्दराजन मुदालियार वापस दक्षिण लौट गया था. करीम लाला और पठान गैंग का खेल खत्म होने को था और दाऊद का सूरज चढ़ने लगा था. पैसा फिल्मों और राजनीति में खत्म हो गया था और धमक, दाऊद गैंग जैसे नए गैंग्स के कारण खत्म हो रही थी. हालांकि 555 सिगरेट पीने वाले मस्तान पर किसी अदालत में कोई गुनाह साबित नहीं हुआ।

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