सबसे बड़ा महाद्वीप

एशिया विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है। विश्व के कुल भूभाग का लगभग 3/10वां भाग या 30% एशिया में है, और इस महाद्वीप की जनसंख्या अन्य सभी महाद्वीपों की संयुक्त जनसंख्या से अधिक है, लगभग 3/5वां भाग या 60%

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Raj Singh
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सबसे बड़ा महाद्वीप

एशिया विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है। विश्व के कुल भूभाग का लगभग 3/10वां भाग या 30% एशिया में है, और इस महाद्वीप की जनसंख्या अन्य सभी महाद्वीपों की संयुक्त जनसंख्या से अधिक है, लगभग 3/5वां भाग या 60%। उत्तर में बर्फ़ीले आर्कटिक से लेकर दक्षिण में ऊष्ण भूमध्य रेखा तक यह महाद्वीप लगभग 10,000 किमी क्षेत्र में फैला हुआ है और अपने में कुछ विशाल, ख़ाली रेगिस्तानों, विश्व के सबसे ऊँचे पर्वतों और कुछ सबसे लंबी नदियों को समेटे हुए है। एशियासंसार का बृहत्तम महाद्वीप, प्राचीन दुनिया के उत्तर-पूर्व भूभाग पर विस्तृत है; इसके उत्तर-पश्चिम में यूरोप और दक्षिण-पश्चिम में अफ्रीका महाद्वीप स्थित हैं।

एशिया के नामकरण के संबंध में विभिन्न मत हैं। यूरोप और एशिया दोनों शब्दों की उद्गमभूमि संभवत: इंजियन सागरीय प्रदेश है जहाँ 'आसु' (सूर्योदयकाल) और 'एर्च' (सूर्यास्तकाल) शब्दों का प्रयोग कालक्रम से क्रमश: टर्की और एशिया तथा ग्रीस और यूरोप के भूभागों के लिए प्रारंभ हुआ। संभवत: एशिया के लिए प्रयुक्त होनेवाला 'आसु' शब्द संस्कृत तत्सम 'ऊषा' (सूर्योदयकाल) का स्थानीय तद्भव प्रयोग मात्र है। प्रस्तुत प्रयोग प्रथम स्थानीय भूखंड मात्र के लिए ही प्रारंभ हुआ किंतु कालांतर में समग्र आधुनिक एशिया के भूभाग के लिए प्रयुक्त होने लगा।

एशिया महाद्वीप उत्तर में लगभग मध्य ध्रुवप्रदेश से लेकर दक्षिण में 13रू (दक्षिणी अरब), 6रू (श्रीलंका) और 10रू (हिंदेशिया) द.अ. रेखाओं तक कुल 1,72,56,000 वर्ग मील क्षेत्र पर फैला है। महाद्वीप की पूर्वी और पश्चिमी सीमाएँ क्रमश: 26रू पू.दे. (बाबा अंतरीप) और 170रू प.दे. रेखा (ईस्ट अंतरीप) तक फैली हुई हैं। अत: एशिया ही एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जिसकी पूर्वी और पश्चिमी सीमाएँ क्रमश: पश्चिमी और पूर्वी देशांतर रेखाओं को स्पर्श करती हैं। एशिया और यूरोप महाद्वीपों की सीमारेखा भौगोलिक दृष्टि से स्पष्ट निर्धारित नहीं है। रूस पूर्वी यूरोप से लेकर साइबेरिया होते हुए एशिया के सुदूर उत्तर-पूर्व तक विस्तृत है और राजनीतिक मानचित्र पर एशिया-यूरोप के मध्य कोई स्पष्ट सीमारेखा अंकित नहीं है। सामान्यत: यह सीमा यूराल पर्वत के पश्चिमी अंचल से होती हुई दक्षिण में यूराल नदी से कैस्पियन सागर और कैस्पियन से काकेशस पर्वत की शिखरपंक्ति द्वारा कालासागर (ब्लैक सी) से संबद्ध मानी जाती है। कुछ लोग इस सीमा को काकेशस पर्वत के दक्षिणी अंचल से गुजरती हुई मानते हैं।

अत: इस अस्पष्ट सीमारेखा के कारण एशिया महाद्वीप के क्षेत्रफल का सर्वथा शुद्ध मापन नहीं हो सका है। फिर भी एशिया महाद्वीप के क्षेत्रफल का सर्वथा शुद्ध मापन नहीं हो सका है। फिर भी एशिया महाद्वीप अपने बृहत्‌ आकर एवं क्षेत्रफल के कारण संसार में महत्वपूर्ण है।यह कुल 164रू देशांतर रेखाओं और 85रू अक्षांश रेखाओं पर फैला हुआ है और संसार का भूखंड इसके अंदर आ जाता है। संसार का कोई भी अन्य महाद्वीप ध्रुव प्रदेश से लेकर भूमध्यरेखीय प्रदेश तक विस्तृत सभी कटिबंधों को समाहित नहीं करता। महाद्वीप के मध्य में स्थित बाल्कश झील और जुंगेरिया प्रदेश समुद्र से लगभग 2,000 मील दूर हैं।

एशिया विषमताओं का महाद्वीप है। यहाँ संसार का सर्वोच्च पर्वतशिखर एवरेस्ट है जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई 29,141 फुट है और यहीं संसार का सबसे नीचा क्षेत्र मृतसागर (डेड सी) भी है, जो समुद्रतल से 1,290 फुट नीचा है। फिलीपाइन द्वीपसमूह के पास स्थित मिंडनाव गर्त संसार का सबसे गहरा सागरगर्त है। संसार का सबसे गरम तथा सबसे ठंडा स्थान भी यहीं है। जैकोबाबाद (सिंध) का अधिकतम तापक्रम 126रू फा. तथा बरखोयांस्क (साहबेरिया) का न्यूनतम तापक्रम -90रू फा. है। इतना ठंडा होने के कारण बरखोयांस्क को संसार का शीतध्रुव भी कहते हैं। सबसे अधिक और सबसे कम तापांतर भी यहीं पर पाए जाते हैं। सिंगापुर का वार्षिक तापांतर 1रू फा. तथा बरखोयांस्क का 119रू फा. है। सबसे अधिक वर्षा के स्थान चेरापूँजी की (खासी की पहाड़ियों में) औसत वार्षिक वर्षा 458फ़फ़ है। 1876 ई. में यहाँ केवल 24 घंटे में 41फ़फ़ वर्षा हुई थी। सबसे कम वर्षावाला स्थान अदन है, जहाँ केवल 1.8फ़फ़ वार्षिक वर्षा होती है। अत: संसार में सबसे आर्द्र तथा सबसे शुष्क जलवायु के क्षेत्र भी एशिया ही में मिलते हैं। अन्य महाद्वीपों की अपेक्षा एशिया की औसत ऊँचाई ज्यादा है, परंतु साथ ही यहाँ मैदान भी अन्य महाद्वीपों के मैदानों के अपेक्षा अधिक समतल हैं। गंगा के मैदान में वाराणसी से समुद्रतट (डेल्टा प्रदेश) तक की ढाल 5फ़फ़ प्रतिमील है।

एशिया की जनसंख्या लगभग 2,10,90,00,000 है, जो संपूर्ण विश्व की जनसंख्या (3,70,00,00,000) की 57 प्रतिशत है। यहाँ जनसंख्या के अधिक घनत्ववाले भागों के साथ-साथ कम घनत्ववाले विस्तृत प्रदेश तथा निर्जन मरुस्थल भी हैं। एशिया को आदिमानव का जन्मस्थान होने का भी सौभाग्य प्राप्त है। यहीं विश्व के सभी बड़े धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ है। हिंदू, बौद्ध, ईसाई तथा इस्लाम धर्म यहीं जन्म लेकर फूले-फले हैं। एशिया में 68 मानवजातीय वर्ग मिलते हैं। इतने किसी भी दूसरे महाद्वीप में नहीं हैं। यहाँ पर सब तरह के लोग हैं। एक ओर तो मनुष्य जंगलों में विचरते हैं, नंगे रहते तथा शिकार कर और जंगली कंद-मूल-फल खाकर निर्वाह करते हैं, दूसरी ओर आधुनिक सभ्य मानव हैं, जो आधुनिकतम साधनों का प्रयोग करते हैं। यहाँ पर पूँजीवाद तथा साम्यवाद एवं राजतंत्र तथा गणतंत्र सभी फूल फल रहे हैं।

एशिया की खोज-एशिया विशाल महाद्वीप है। इसके विभिन्न भाग पर्वतों, मरुस्थलों तथा वनों आदि के कारण एक दूसरे से अलग हैं। इसी कारण प्रारंभ में बहुत से प्रदेशों के बारे में लोगों का ज्ञान कम था। मध्ययुग के पश्चात्‌ धीरे-धीरे मार्गों का विकास होने पर यूरोप के लोगों ने एशियाई देशों से संपर्क स्थापित किया। इससे पूर्व एशिया निवासियों ने यूरोप की खोज की थी। फ़िनीशिया (पश्चिमी एशिया) के नाविक भूमध्यसागरीय मार्गों से उत्तरी अफ्रीका तथा ब्रिटेन पहुँचे। दक्षिण-पश्चिम एशियाई प्रदेश एशिया तथा यूरोप के बीच सेतु के समान हैं। ईसा की दूसरी शताब्दी में चीन के हान वंशयी राजाओं ने चीनी साम्राज्य का विस्तार कैस्पियन सागर के समीपस्थ स्थानों तक किया। उधर रोम का साम्राज्य तुर्की तक बढ़ा। तत्पश्चात्‌ यूनानी सेनाएँ सिकंदर महान्‌ के नेतृत्व में सीरिया, ईरान और अफगानिस्तान होती हुई 327 ई.पू. में भारत आ पहुँचीं। सिकंदर को विपासा (व्यास) नदी के तट से लौटना पड़ा। उच्च सभ्यता तथा एशिया के निकट बसने के कारण यूनानियों ने एशिया की खोज सर्वप्रथम की। यद्यपि उनका साम्राज्य चिरस्थायी न रहा, फिर भी उन्होंने एशिया पर काफी प्रभाव डाला और स्वयं भी यथेष्ट प्रभावित हुए। मध्ययुग में पूर्व-पश्चिम के संपर्क कम थे। तत्पश्चात्‌ वेनिस प्रजातंत्र ने कुस्तुंतुनिया पर अभियान किया। यूरोप तथा एशियाई देश चीन के बीच संभवत: सर्वप्रथम रेशम का व्यापार आरंभ हुआ। वेनिस के दो व्यापारी निकोलो तथा मेफ़ियोपोलो 1251 ई. में कुस्तुंतुनिया होते हुए चीन गए। 1254 ई. में रूब्रुक निवासी विलियम कुबला खाँ के दरबार में पहुँचा। 1271 ई. में फिर दोनों मेफ़ियो के पुत्र मार्कोपोलो को साथ लेकर, रूम सागर के एशियाई तट पर पहुँचकर स्थलमार्ग से उर्मुज, काशगर, क्युनलुन होते हुए मई, 1275 ई. में पीकिंग पहुँचे। मार्कोपोलो ने चीन दरबार में नौकरी कर ली। 1295 ई. में वह वेनिस लौटा। इन यात्राओं से यूरोप तथा एशियाई देशों के बीच संपर्क बढ़ा और रेशम, मसाला, चाय इत्यादि का व्यापार होने लगा। फिर शक्तिशाली तुर्कों की बर्बरता के कारण यूरोप तथा एशिया के स्थलमार्गों द्वारा होनेवाला व्यापार 200 वर्षों तक बंद रहा। यूरोप के लोगों ने दूसरे मार्ग ढूंढ़ने प्रारंभ किए। वास्को डि गामा नामक एक पुर्तगाली नाविक समुद्री मार्ग से 1498 ई. में कालीकट पहुँचा। इसके बाद व्यापारी तथा ईसाई धर्मप्रचारक एशियाई देशों में अधिक संख्या में आने लगे। धीरे-धीरे व्यापार के उद्देश्य से आए हुए यूरोपीय लोगों ने एशिया के अनेक भागों पर न केवल व्यापारिक केंद्र स्थापित किए, अपितु धीरे-धीरे अपना आधिपत्य भी जमा लिया। अंग्रेजों ने भारत, लंका, ब्रह्मा, मलय, हांगकांग आदि स्थानों में, फ्रांस ने हिंदचीन तथा स्याम में और हालैंड ने जावा, सुमात्रा आदि पूर्वी द्वीपसमूहों पर अधिकार जमा लिया। उत्तर में रूस ने अपना अधिकार सुदृढ़ किया तथा प्रभावक्षेत्र बढ़ाया। सन्‌ 1868 ई. में स्वेज़ नहर खुलने पर यूरोप तथा एशिया के संबंधों में एक नई कड़ी जुड़ी और लोगों ने वास्को डि गामा के उत्तमाशांतरीपवाले मार्ग को त्याग दिया। ट्रांस साइबेरियन रेलवे ने भी यूरोप तथा एशिया के संबंध दृढ़ किए। स्थानाभाव के कारण यहाँ पर एशिया के सभी समन्वेषकों की यात्राओं का वर्णन करना संभव नहीं है। 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों के प्रमुख समन्वेषक रैल्फ़ फ़िच, टामस रो, लावाल तथा टेवर्नियर थे। स्वीडनवासी नूरडेनशल्ड ने 1878 ई. से 1880 तक उत्तरपूर्वी मार्ग द्वारा यूरोप से बेरिंग जलडमरूमध्य तक यात्रा की। तत्पश्चात्‌ स्वेनहेडिन, सर फ्ऱांसिस यंगहसबैंड, आरेल स्टाइन, प्रिंस क्रोपाटकिन, एल्सवर्थ हंटिगटन तथा स्वामी प्रणवानंद ने मध्य एशिया में गहन शोध कार्य किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्‌ यूरोपीय साम्राज्यवाद के पैर एशिया से उखड़ गए तथा अब उसका अंत हो गया है।

धरातल-एशिया की प्राकृतिक बनावट अपने ढंग की अनोखी है। इसके अंतराल में पर्वतों का विषम जाल बिछा हुआ है। इन हिममंडित पर्वत पंक्तियों की संकुलता के कारण महाद्वीप की भव्यता अतुलनीय हो जाती है। 24,000 फुट से अधिक ऊँचे संसार में कुल 94 पर्वतशिखरों में से 92 केवल हिमालय और काराकोरम श्रेणियों में तथा शेष दो अल्ताईपार श्रेणियों में स्थित हैं। संसार की सर्वाधिक विस्तृत नीची भूमि महाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में फैली है, जहाँ कैस्पियन की नीची भूमि संसार का सबसे बड़ा, समुद्रतल से भी नीचा, शुष्क प्रदेश है। अत: न केवल बृहत्‌ आकार के कारण प्रत्युत विषम प्राकृतिक संरचना के विचार से भी यह महाद्वीप सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

महाद्वीप की विशाल पर्वतपंक्तियाँ दक्षिण-पश्चिम में लालसागर से प्रारंभ होकर सुदूर उत्तर-पूर्व में जलडमरूमध्य तक फैली हुई हैं। एक ओर जहाँ अरब के दक्षिणी समुद्रतट पर 10,000 फुट ऊँचे पर्वत हैं वहाँ दूसरी ओर एशिया माइनर और सीरिया के मध्य स्थित टारस श्रेणियाँ 13,000 फुट से भी अधिक ऊँची हैं जिनमें अकेली अरारात की चोटी (16,873 फुट) स्थित है। पास ही काकेशस श्रेणियों से आबद्ध एलबुर्ज पर्वत 18,000 फुट से भी ऊँचे हैं। कैस्पियन के दक्षिण-पूर्व ईरान की एलबुर्ज श्रेणियों में स्थित देमावेंड शिखर इससे भी अधिक ऊँचा है। दक्षिणी प्राचीन भूभाग में एक ओर जहाँ भारत के दक्षिणी पठार में पर्वतों, घाटियों और छोटे-छोटे लगभग समतलीय क्षेत्रों की विषम संकुलता है, वहाँ मलय प्रायद्वीप में उत्तर से दक्षिण सिंगापुर तक पर्वतपंक्तियाँ पाई जाती हैं। इसी प्रकार एशिया के दक्षिण, मध्य एर्व पूर्व से होते हुए सुदूर साइबेरिया तक पर्वतों का अत्यंत विषम जाल बिछा हुआ है। न केवल महाद्वीप भाग ही, प्रत्युत अधिकांश द्वीपसमूह-जापान, फारमोसा, हिंदेशिया, श्रीलंका आदि-भी पर्वतसुंकुल हैं। अत: महाद्वीप के प्रत्येक भाग में पर्वतश्रेणियाँ बिखरी पड़ी हैं।

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