वायुदेव वरदान

वेदों में वायु को अंतरिक्ष का देवता माना गया है। वायु का मतलब हवा (पवन)। हालांकि वायु को किसी ने देखा नहीं, लेकिन एहसास तो सभी को है कि वह हमारे चारों ओर है।

Posted 5 days ago in Other.

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arjun bhuriya
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सच तो यह है कि वायु है तो जीवन है, हम हैं। इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर वायु न हो तो धरा पर हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो जाए। ऐसा एक बार हो चुका है। हुआ यह था कि देवराज इंद्र ने पवनपुत्र हनुमान की ठुड्डी पर वज्र से प्रहार कर दिया था। कारण बाल्यावस्था में हनुमान ने सूर्य को फल समझकर मुख में रख लिया था। इस बात से वायुदेव क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना अस्तित्व समेट लिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। आखिरकार इंद्र ने हनुमान को प्रसन्न होकर वरदान दिया तब कहीं जाकर उनका क्रोध दूर हुआ। ऋग्
वेद में इंद्र के साथ ही वायु का उल्लेख एक देवता के रूप में है।


वायु का मतलब हवा (पवन)। हालांकि वायु को किसी ने देखा नहीं, लेकिन एहसास तो सभी को है कि वह हमारे चारों ओर है। सच तो यह है कि वायु है तो जीवन है, हम हैं। इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर वायु न हो तो धरा पर हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो जाए। ऐसा एक बार हो चुका है। हुआ यह था कि देवराज इंद्र ने पवनपुत्र हनुमान की ठुड्डी पर वज्र से प्रहार कर दिया था। कारण बाल्यावस्था में हनुमान ने सूर्य को फल समझकर मुख में रख लिया था। इस बात से वायुदेव क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना अस्तित्व समेट लिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। आखिरकार इंद्र ने हनुमान को प्रसन्न होकर वरदान दिया तब कहीं जाकर उनका क्रोध दूर हुआ।
ऋग्वेद में इंद्र के साथ ही वायु का उल्लेख एक देवता के रूप में है।
वायुदेवता का जन्म विश्वपुरुष से हुआ था। ऋग्वेद में कहा गया है कि विश्वपुरुष की श्वास से वायुदेव उत्पन्न हुए। वेदों के अनुसार इनका स्वरूप रूप सुंदर और मनोहारी है। वायु देवता की खूबी यह है कि इनके सहस्त्र (हजार) नेत्र हैं। एक अद्भुत प्रकाशमान रथ पर विराजमान होते हैं। इस रथ को हजार अश्वों का एक दल खींचता है।
वायु देवता के अंश से उत्पन्न अनेक संतानों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है। इनमें हनुमान, भीमसेन (पांच पांडवों में से एक), इला इन्हीं की संतान मानी गई हैं। वायु देवता की उपासना का बड़ा महत्व है। इनकी उपासना करने से संतान की प्राप्ति तो होती ही है। साथ ही उपासक को जीवन में यश भी प्राप्त होता है। ऋग्वेद में ऐसा भी कहा गया है कि ये शत्रुओं को भगाते हैं और निर्बलों की रक्षा करते हैं। मत्स्यपुराण में कृष्ण मृग पर सवार प्रतिमा पूजन का उल्लेख भी

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