कवक या फफूंद 

फफूंद या कवक एक प्रकार के पौधे हैं जो अपना भोजन सड़े गले म्रृत कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। ये संसार के प्रारंभ से ही जगत में उपस्थित हैं। इ

Posted 3 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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फफूंद या कवक एक प्रकार के पौधे हैं जो अपना भोजन सड़े गले म्रृत कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। ये संसार के प्रारंभ से ही जगत में उपस्थित हैं। इनका सबसे बड़ा लाभ इनका संसार में अपमार्जक के रूप में कार्य करना है। इनके द्वारा जगत में से कचरा हटा दिया जाता है।[1]


कवक (फंगस, Fungus) जीवों का एक विशाल समुदाय है जिसे साधारणतया वनस्पतियों में वर्गीकृत किया जाता है। इस वर्ग के सदस्य पर्णहरिम (chlorophyll) रहित होते हैं और इनमें प्रजनन बीजाणुओं (spore) द्वारा होता है। ये सभी सूकाय (thalloid) वनस्पतियाँ हैं, अर्थात् इनके शरीर के ऊतकों (tissues) में कोई भेदकरण नहीं होता; दूसरे शब्दों में, इनमें जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं तथा इनमें अधिक प्रगतिशील पौधों की भाँति संवहनीयतंत्र (vascular system) नहीं होता। पहले इस प्रकार के सभी जीव एक ही वर्ग कवक के अंतर्गत परिगाणित होते थे, परंतु अब वनस्पति विज्ञानविदों ने कवक वर्ग के अतिरिक्त दो अन्य वर्गों की स्थापना की है जिनमें क्रमानुसार जीवाणु (bacteria) और श्लेष्मोर्णिका (slime mold) हैं। जीवाणु एककोशीय होते हैं जिनमें प्रारूपिक नाभिक (typical nucleus) नहीं होता तथा श्लेष्मोर्णिक की बनावट और पोषाहार (, nutrition) जंतुओं की भाँति होता है। कवक अध्ययन के विज्ञान को कवक विज्ञान (mycology) कहते हैं।


कुछ लोगों का मत है कि कवक की उत्पत्ति शैवाल (algae) में पर्णहरिम की हानि होने से हुई है। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो कवक को पादप सृष्टि (Plant kingdom) में रखना उचित ही है। दूसरे लोगों का विश्वास है कि इनकी उत्पत्ति रंगहीन कशाभ (flagellata) या प्रजीवा (protozoa) से हुई है जो सदा से ही पर्णहरिम रहित थे। इस विचारधारा के अनुसार इन्हें वानस्पतिक सृष्टि में न रखकर एक पृथक सृष्टि में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।


वास्तविक कवक के अंतर्गत कुछ ऐसी परिचित वस्तुएँ आती हैं, जैसे गुँधे हुए आटे (dough) से पावरोटी बनाने में सहायक एककोशीय खमीर (yeast), बासी रोटियों पर रूई की भाँति उगा फफूँद, चर्म को मलिन करनेवाले दाद के कीटाणु, फसल के नाशकारी रतुआ तथा कंडुवा (rust and smut) और खाने योग्य एव विषैली कुकुरमुत्ते या खुंभियाँ ] को मलिन करनेवाले दाद के कीटाणु, फसल के नाशकारी रतुआ तथा कंडुवा (rust and smut) और खाने योग्य एव विषैली कुकुरमुत्ते या खुंभियाँ

रहन-सहन और वितरणसंपादित करें



कवक की एक प्रजाति़

कवक की जातियों की संख्या लगभग 80 से 90 हजार तक है। संभवत: कवक सबसे अधिक व्यापक हैं। जलीय कवक में एकलाया (Achlaya), सैप्रोलेग्निया (Saprolegnia), मिट्टी में पाए जानेवाले म्यूकर (Mucor), पेनिसिलियम (Penicillium), एस्परजिलस (Aspergillus), फ़्यूज़ेरियम (Fusarium) आदि; लकड़ी पर पाए जानेवाले मेरूलियस लैक्रिमैंस (Merulius lachrymans); गोबर पर उगनेवाले पाइलोबोलस (Pilobolus) तथा सॉरडेरिया (Sordaria); वसा में उगनेवाले यूरोटियम (Eurotium) और पेनिसिलियम की जातियाँ हैं। ये वायु तथा अन्य जीवों के शरीर के भीतर या उनके ऊपर भी पाए जाते हैं। वास्तव में विश्व के उन सभी स्थानों में कवक की उत्पत्ति हो सकती है जहाँ कहीं भी इन्हें कार्बनिक यौगिक की प्राप्ति हो सके। कुछ कवक तो लाइकेन (lichen) की संरचना में भाग लेते हैं जो कड़ी चट्टानों पर, सूखे स्थान में तथा पर्याप्त ऊँचे ताप में उगते हैं, जहाँ साधारणतया कोई भी अन्य जीव नहीं रह सकता।

कवक की अधिकाधिक वृद्धि विशेष रूप से आर्द्र परिस्थितियों में, अँधेरे में या मंदप्रकाश में होती है। इसीलिए छत्रक अधिक संख्या में आर्द्र और उष्ण तापवाले जंगलों में उगते हैं।

वानस्पतिक शरीर की संरचनासंपादित करें

कुछ एककोशिकीय जातियों, उदाहरणार्थ खमीर, के अतिरिक्त अन्य सभी जातियों का शरीर कोशिकामय होता है, जो सूक्ष्मदर्शीय ((माइक्रोस्कोपिक)) रेशों से निर्मित होता है और जिससे प्रत्येक दिशा में शाखाएँ निकलकर जीवाधार (substratum) के ऊपर या भीतर फैली रहती हैं। प्रत्येक रेशे को कवकतंतु (hypha) कहा जाता है और इन कवकतंतुओं के समूह को कवकजाल (mycelium) कहते हैं। प्रत्येक कवकतंतु एक पतली, पारदर्शी नलीय दीवार का बना होता है जिसमें जीवद्रव्य का एक स्तर होता है या जो जीवद्रव्य से पूर्णतया भरा होता है। ये शाखी या अशाखी रहते हैं और इनकी मोटाई 0.5 माइक्रान से लेकर 100 माइक्रान तक होती है (1 माइक्रान = एक मिलीमीटर का हजारवाँ भाग)।

जीवद्रव्य या तो अटूट पूरे कवकतंतु में फैला रहता है जिसमें नाभिक (nucleus) बिना किसी निश्चित व्यवस्था के बिखरे रहते हैं, अन्यथा कवकतंतु दीवारों का पट (septum) द्वारा विभाजित रहते हैं जिससे संरचना बहुकोशिकीय होती है। पहली अवस्था को बहुनाभिक (coenocytic) तथा दूसरी को पटयुक्त (septate) अवस्था कहते हैं। प्रत्येक कोशिका में एक, दो या अधिक नाभिक हो सकते हैं।

अधिकांश कवक के तंतु रंगहीन होते हैं, किंतु कुछ में ये विभिन्न रंगों से रँगे होते हैं।

साधारण कवक का शरीर ढीले कवकतंतुओं से निर्मित होता है किंतु कुछ उच्च कवकों के जीवनवृत्त की कुछ अवस्थाओं में उनसे कवकजाल घने होकर सघन ऊतक बनाते हैं जिसे संजीवितक (plectenchyma) और कूटजीवितक (preudoparenchyma)।

दीर्घितक ढीला ऊतक होता है, जिसमें प्रत्येक कवकतंतु अपना अपनत्व बनाए रखता है। कूटजीवितक में सूत्र काफी घने होते हैं तथा वे अपना ऐकात्म्य खो बैठते हैं और काटने पर उच्चवर्गीय पौधों के जीवितक कोशों (Parenchyma cells) के समान दिखाई पड़ते हैं। इन ऊतकों से विभिन्न प्रकार के वानस्पतिक और प्रजनन विन्यास (reproductive structure) का निर्माण होता है।

कवक की बनावट चाहे कितनी ही जटिल क्यों न हो, पर वे सभी कवकतंतुओं द्वारा ही निर्मित होते हैं। ये तंतु इतने सघन होते हैं कि वे ऊतक के रूप में प्रतीत होते हैं, किंतु कवकों में कभी भी वास्तविक ऊतक नहीं होता।

कोशिकाभित्ति (cell wall) की रासायनिक संरचना एवं कोशिका विज्ञान (cytology)संपादित करें

कुछ जातियों को छोड़कर कवकों की कोशिकाभित्तियों की रासायनिक व्याकृतियाँ (chemical composition) विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न होती हैं। कुछ जातियों की कोशिकाभित्तियों में सेलुलोस या एक विशेष प्रकार का कवक सेल्यूलोस पाया जाता है तथा अन्य जातियों में काइटिन (chitin) कोशिकाभित्ति के निर्माण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होता हैं। कई कवकों में कैलोस (callose) तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ भी कोशिकाभित्ति में पाए गए हैं।

कवकतंतु में नाभिक के अतिरिक्त कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) तैलविंदु तथा अन्य पदार्थ उपस्थित रहते हैं, उदाहरणार्थ कैल्सियम ऑक्सलेट, (calcium oxalate) के रवे, प्रोटीन कण इत्यादि। प्रत्येक जाति में प्रोटोप्लास्ट (protoplast) हरिमकणक (chloroplast) रहित होता है। यद्यपि कोशिकाओं में स्टार्च का अभाव होता है, तथापि एक दूसरा जटिल पौलिसैकेराइड ग्लाईकोजन (polysaccharide glycogen) पाया जाता है।

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