जीवाणु-विज्ञान

जीवाणु-विज्ञान (Bacteriology) जीवाणुओं के अध्ययन से संबंधित है, पर प्राय: जीवाणुविज्ञान अणुजीव विज्ञान (Microbiology) के पर्यायावाची अर्थ में भी प्रयु

Posted 3 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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जीवाणु-विज्ञान (Bacteriology) जीवाणुओं के अध्ययन से संबंधित है, पर प्राय: जीवाणुविज्ञान अणुजीव विज्ञान (Microbiology) के पर्यायावाची अर्थ में भी प्रयुक्त होता हैं। मनुष्य के शरीर में जीवाणु की उपस्थिति का पता सर्वप्रथम 1880 ईo में लगा और जीवाणुओं का अध्ययन चिकित्सा-विज्ञान का अंग बना। कुछ ऐसे जीवाणु भी मालूम हैं, जो मनुष्य के शरीर में रहते हुए उसे कोई हानि नहीं पहुंचाते और उपयोगी हैं। सच तो यह है कि मनुष्य का अस्तित्व जीवाणुओं की क्रियाओं पर ही आधारित है। जीवाणुओं के बिना पृथ्वी परजीव जंतु एवं पौधे जीवित नहीं रह सकते, क्योंकि इनका अस्तित्व भूमि के उपजाऊपन पर निर्भर है तथा पृथ्वी का उपजाऊपन पृथ्वी में रहनेवाले इन सूक्ष्म जीवों की क्रियाओं पर निर्भर हैं। 

जीवाणु विज्ञान का प्रारंभ -


इसका प्रारंभ सूक्ष्मदर्शी (microscope) के विकास के साथ साथ हुआ। एक डच वैज्ञानिक एo वान लेवेनहूक (A. van Leewenhoek) ने सर्व-प्रथम अपने निरीक्षणों का सही सही चित्रों के साथ वर्णन किया। संभव है, इसके पूर्व भी जीवाणुओं को किसी ने देखा हो, किंतु वर्णन इसी ने किया। वे जीव कुछ बड़े आकार के जीवाणु, जैसे बैसिलस बक्कालिस (Bacillus buccalis) तथा स्पाइरिलम स्पूटिजिनम (Spirillum sputigenum) प्रारूप प्रतीत होते हैं। 

यह स्पष्ट है कि जीवाणु स्पष्ट रूप से दिखाई देने से पहले ही पहिचान लिए गए थे। ओo एफo मूलर (O. F. Muller) ने अनेक आकार सन्‌ 1773 में ही देख लिए थे। एफo एरेनबर्ग (F. Ehreaberg) ने सन्‌ 1830 में जीवाणुओं की भिन्नता का पता लगाया और इनका विभाजन प्रस्तुत किया। इन्होंने सन्‌ 1838 में जीवाणुओं की कम से कम 16 जातियों को प्रस्तावित कर उनको चार समूहों या जेनरा में विभाजित किया। जीवाणुओं के आकार का नवीन एवं परिशुद्ध ज्ञान एफo जेo कोन (F. J. Cohn) के अनुसंधान द्वारा प्राप्त हुआ। इन्होंने 1872 ईo में जीवाणुओं का वर्गीकरण प्रकाशित किया। ऐसा प्रतीत होता है कि शइजोमाइसीटीस (Schizomycetes) में बीजाणु उत्पन्न होने की सत्यता कोन ने मालूम की। इन्होंने सन्‌ 1876 में जीवाणुओं का अंकुरण देखा तथा रौबर्ट कॉख (Robert Koch), ओo ब्रेफेल्ट पीo वॉन टीघम (P. von Tiegham) तथा एo डीo बैरी (A. de Bary) ने तथ्य की पुष्टि की। 

कोन द्वारा प्रेषित 'आकार की स्थिरता' का सिद्धांत सन्‌ 1873 में आलोचित हुआ, जब कि लैंकैस्टर (Lancaster) ने निर्देशित किया कि उनका बैक्टीरियम रूबेसेंस (Bacterium rubescens) कई ऐसी आकृतियों से होकर बढ़ता है जिनको कोन ने विभिन्न जातियों में ही नहीं बल्कि विभिन्न जेनरा में रखा था। यथार्थ में विभिन्न आकार जैसे जीवाणु, एकल गोलाणु (Micrococcus), दंडाणु (Bacillus) तथा लेप्टो्थ्राक्स (Leptothrix) एक जीवन इतिहास की विभिन्न अवस्थाओं में पाए जाते हैं। जेo लिस्टर (J. Lister) ने इस विचार की पुष्टि की। टीo बिलब्रीथ (T. Billbroth) ने सन्‌ 1874 में यह विचार प्रगट किया कि विभिन्न जीवाणु केवल एक जीव की विभिन्न दशाएँ हैं और उसने इस जीव का नाम कोको बैक्टीरिया सेप्टिका (Cocco Bacteria septica) रखा। उस समय से जीवाणुओं की बहुरूपता पर पूर्ण रूप से तर्क-वितर्क किया गया। इस पर साधारणत: सहमति है कि कुछ जीवाणु अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में कई प्रकार की कोशिकाएँ प्रदर्शित करते हैं परंतु अधिकतर जीवाणु अपने जीवन काल में केवल एक प्रकार की कोशिकाओं का प्रदर्शन करते हैं। 

जीवाणुओं की आकारिकी के साथ साथ उनका किण्वन (fermentation) तथा उनका रोगों से क्या संबंध है, इसका पत लगाने का भी प्रयत्न किया गया। लुई पैस्टर (L. Pasteur) ने सन्‌ 1857 में दिखलाया कि लैक्टिक (Lactic) किण्वन एक जीवधारी की उपस्थिति पर निर्भर है। वस्तुत: यह टीo श्वान (T. Schwann, 1843) के अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि किण्वन एवं पूतिक्रिया (Putrefaction) वायु में पाए जानेवाले जीवधारियों की उपस्थिति से संबंधित हैं। सन्‌ 1862 में पैस्टर ने बिना किसी उचित शंका के प्रदर्शित किया कि यूरिया (urea) का ऐमोनियामय किण्वन एक सूक्ष्म जीवाणु की क्रिया के कारण होता है। उसी वर्ष पैस्टर ने दिखलाया कि जीवाणु या किसी अन्य जीवधारी के अभाव में पूतिक्रिया नहीं हो सकती। 

जीवाणु प्रविधि की आधुनिक विधियों का प्रादुर्भाव सन्‌ 1870 से 1885 के बीच हुआ। सन्‌ 1871 में विगर्ट (Weigert) ने अभिरंजकों (stains) की उपयोगिता बतलाई तथा सन्‌ 1881 में रौबर्ट कॉख ने जीवधारियों के मिश्रण को पोषक पदार्थ की प्याली पर अलग अलग करने की विधि खोज निकाली। एक अत्यंत महत्वपूर्ण आविष्कार सन्‌ 1880 में सामने आया जब पैस्ट ने सर्वप्रथम यह दिखलाया कि 42 सेंo 43 सेंo ताप पर रखे गेए बैसिलस ऐंथ्रोसिस (Bacillus anthracis) के संवर्धन ने कुछ पीढ़ी पश्चात्‌ अपनी तीव्रता त्याग दी तथा उसमें चूहे को मारने की भी शक्ति नही रही। इस खोज ने सीरम चिकित्सा की नींव डाली। 

सन्‌ 1888 में हेलब्रीगल (Helbriegel) तथा विल्फार्थ (Wilfarth) ने लेग्यूमीनोसी (Leguminosae) वर्गीय पौधों तथा जीवाणुओं में सहजीवी संबंध दिखलाया। सन्‌ 1901 में बाइरिंक (Beijerinck) ने स्वाश्रय नाइट्रोजन-अनुर्वधक जीवाणु एजोटेबेक्टर (Azotobacter) की खोज की तथा भूमि को उपजाऊ बनाने में उसकी उपयोगिता का वर्णन किया। 19वीं शताब्दी के अंत में ईo सीo हैंसन (E. C. Hansen) ने जीवाणुओं के विशुद्ध संवर्धन के अध्ययन की नींव डाली तथा औद्योगिक किण्वन का अध्ययन प्रारंभ किया। उन्हीं दिनों उत्तरी अमरीका में बरिल (Burrill) ने जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न नाशपाती के एक रोग का वर्णन किया। 

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