रामायण का महत्व

संस्Ñत साहित्य की परिधि में किसी अन्य ग्रन्थ ने भारत के जनसाधरण को इतना अधिक प्रभावित नहीं किया है जितना कि रामायण ने। प्रोपफेसर विन्टरनिटज की यह मान्

Posted 3 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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संस्Ñत साहित्य की परिधि में किसी अन्य ग्रन्थ ने भारत के जनसाधरण को इतना अधिक प्रभावित नहीं किया है जितना कि रामायण ने। प्रोपफेसर विन्टरनिटज की यह मान्यता है कि संसार के सम्पूर्ण साहित्य में रामायण के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थ ने शताबिदयों तक किसी राष्ट्र की विचारधरा एवं काव्य को इतना अधिक प्रभावित नहीं किया है।
भारत के महान संस्Ñत कवियों यथा भास, कालिदास, भवभूति एवं अनेक कवियों ने वाल्मीकि की Ñतियों से कथानक ग्रहण किये एवं उनका अपने काव्यों और नाटकों में नियोजन किया। न केवल संस्Ñत के ही कवियों को इस अदभुत काव्य से प्रेरणा मिली अपितु भारत की परवर्ती भाषाओं की कविता को भी इसी काव्य से प्रेरणा मिली। मèययुगीन कवियों के कर्णधर तुलसीदास का रामचरित मानव वाल्मीकि रामायण के प्रभाव एवं प्रसि(ि में तो लगभग प्रतिस्पधर््ी ही सि( हुआ। रामायण का यह प्रभाव केवल उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है। तमिल भाषा में लिखी गर्इ कम्बन रामायण का दक्षिण में भी वही प्रभाव रहा जो कि उत्तर भारत में तुलसीदास की रामायण का। रामायण के इस कथानक ने भारत की सीमाओं के परे भी प्रभाव डाला और आज भी दक्षिण एशिया के बालि द्वीप में राम के इस कथानक का प्रचार मिलता है। राम के इस कथानक का प्रभाव बौ( साहित्य पर भी हुआ जैसे कि 'दशरथजातक से स्पष्ट हो जाता है। यह बात èयान देने योग्य है कि 'महाभारत से सम्ब( केवल एक ही त्यौहार है, जन्माष्टमी किन्तु राम के कथानक से सम्ब( अनेक त्यौहार मिलते है, जैसे रामनवमी, विजयादशमी एवं दीपावली। विजयादशमी न केवल राम की रावण के ऊपर विजय को इंगित करती है अपितु वह अच्छार्इ की बुरार्इ पर, पुण्य की पाप पर एवं प्रकाश की अन्ध्कार पर विजय को भी इंगित करती है। इसी प्रकार दीपावली न केवल राम के अयोèया आगमन विषयक तत्क्षण अदभुत आनन्द को ही प्रस्तुत करती है, अपितु हमारे जीवन में नैतिक आदर्शो के पुनरागमन को भी सूचित करती है। इस तरह रामायण भारतीयों के लिए उत्साह का एक अखण्ड स्रोत रही है।
2. आदिकवि (प्रथम कवि) वाल्मीकि
रामायण के संस्Ñत कविता का प्रधन स्रोत होने के कारण, वाल्मीकी वास्तव में आदिकवि (प्रथम कवि) के रूप में माने जाते हैं।
संस्Ñत साहित्य में सर्वप्रथम काव्य निर्मित होने के कारण वेद एवं उनके अंग (वेदांग) सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हैं।
पिफर भी 'आदिकवि यह उपनाम केवल वाल्मीकि से इतना अधिक सम्ब( एवं एकरूप है कि बहुत समय से यह वाल्मीकि के विशेषण के रूप में ही नहीं अपितु वाल्मीकि का सम्बोध्न इसी नाम से होने लगा है। 'आदिकाव्य यह नाम वाल्मीकि की स्वयं अपनी खोज है क्योंकि रामायण में वे अपने काव्य को 'आदिकाव्य के नाम से सम्बोधित करते हैं। पुनश्च, जहाँ वैदिक )षि ध्र्म के व्यवस्थापन एवं प्रचार के लिए वाणी का प्रयोग करते हैं वहाँ लौकिक संस्Ñत काल में कवियों ने काव्य
को ध्र्म के तत्त्व का त्याग न करते हुए जनसमाज के आस्वाद के योग्य भी बनाया। इस सम्बन्ध् में यह अवश्य कहा जा सकता है कि यह परिवर्तन सर्वप्रथम वाल्मीकि के द्वारा ही आविष्Ñत किया गया।
आदि कवि वह नाम तो इसलिए है कि यह सचमुच एक नये पहलू की ही खोज थी। 'शोक: श्लोकत्वमागत: यह कथन इस बात को सूचित करता है कि वाल्मीकि ने ही सर्वप्रथम इस तथ्य की गवेषणा की कि, ''वास्तविक कविता कवि के âदय का वह आकसिमक प्रवाह है जो निसर्ग के क्रन्दन को देखकर परिद्रवित होने पर उदभूत होती है।
कुछ विद्वानों की सम्मति में यह साम्य ब्रह्राा से भी हो सकता है जो देववाणी के प्रथम कवि होने के नाते आदि ।
(जब तक रहेंगी पर्वतों की श्रृंखलायें, और बहती रहेंगी नदियाँ इस ध्रा पर।
रामायण भी सदा त्यों रहती रहेगी, अमर बन मनुष्यों के ओठों पर।।)
भारत के महान संस्Ñत कवियों यथा भास, कालिदास, भवभूति एवं अनेक कवियों ने वाल्मीकि की Ñति से कथानक ग्रहण किए एवं उनका अपने काव्यों और नाटकों में नियोजन किया। न केवल संस्Ñत के ही कवियों को इस अदभुत काव्य से प्रेरणा मिली, अपितु भारत की परवर्ती भाषाओं की कविता को भी इसी अदभुत काव्य से प्रेरणा मिली। मèययुगीन कवियों के कर्णधर महाकवि तुलसीदास का रामचरितमानस वाल्मीकि रामायण के प्रभाव एवं प्रसि(ि में तो लगभग प्रतिस्पधर््ी ही सि( हुआ। रामायण का यह प्रभाव केवल उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है। तमिल भाषा में लिखी गर्इ कम्बन रामायण का दक्षिण में भी वही प्रभाव रहा जो कि उत्तर भारत में तुलसीदास के रामचरितमानस का। रामायण के इस कथानक ने भारत की सीमाओं के परे भी प्रभाव डाला। आज भी दक्षिण एशिया के बालि द्वीप में श्रीराम के इस कथानक का प्रचार मिलता है। इस कथानक का प्रभाव नासितक बौ( साहित्य पर भी हुआ जैसे कि 'दशरथजातक से स्पष्ट हो जाता है। यह बात èयान देने योग्य है कि 'महाभारत से सम्ब( केवल एक ही त्योहार है जन्माष्टमी, किन्तु श्रीराम के कथानक से सम्ब( अनेक त्योहार मिलते
हैं, जैसे रामनवमी, विजयदशमी एवं दीपावली। विजयदशमी न केवल राम को रावण के ऊपर विजय इंगित करती है, वह अच्छार्इकी बुरार्इ के ऊपर, पुण्य की पाप के ऊपर एवं प्रकाश की अंध्कार के ऊपर विजय को भी इंगित करती है। इसी प्रकार दीपावली न केवल भगवान राम के अयोèया आगमन विषयक अदभुत आनन्द को ही प्रस्तुत करती है, अपितु हमारे जीवन में नैतिक आदर्शों के पुनरागमन को भी सूचित करती है। इस तरह रामायण भारतीयों के लिए उत्साह का एक अखंड स्रोत रही है। ऐतिहासिक एवं अलंÑत काव्य की दृषिट से ही रामायण महत्त्वपूर्ण नहीं है अपितु यह हिन्दुओं का आचारशास्त्रा एवं ध्र्मशास्त्रा भी है। रामायण की शिक्षायें व्यावहारिक हंै। अत: उनका समझना भी सुगम है। रामायण में हमें जीवन की सूक्ष्म और गम्भीर समस्याएं सुलझे हुए रूप में मिल जाती हैं। यह धर्मिक दृषिट से प्राचीन संस्Ñति, आचार, सत्य, ध्र्म, व्रत पालन, विविध् यज्ञों का महत्त्व आदि विषयों का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करती है। सामाजिक दृषिट से यह पति-पत्नी के सम्बन्ध्, पिता पुत्रा के कत्र्तव्य, गुरु शिष्य का पारस्परिक व्यवहार, भार्इ का भार्इ के प्रति कत्र्तव्य, व्यकित का समाज के प्रति उत्तरदायित्व, पिता-माता, पुत्रा, भार्इ, पति-पत्नी के आदर्श को प्रस्तुत करती है। सांस्Ñतिक दृषिट से यह राम राज्य का आदर्श, वानर आदि जातियों में आर्य संस्Ñति का प्रसार, नैतिकता, सत्य के प्रति निष्ठा और कत्र्तव्य के लिए त्याग का आदर्श चित्राण करती है। राजनीतिक दृषिट से राजा के कत्र्तव्य और अधिकार, उसका प्रजा के साथ सम्बन्ध्, उत्तराधिकार, शत्राु-नाश और सैन्य संचालन आदि विषयों का महत्त्वपूर्ण चित्राण करती है।
3.आदिकवि वाल्मीकि
रामायण के संस्Ñत कविता का प्रधन स्रोत होने के कारण, वाल्मीकि वास्तव में आदिक (प्रथम कवि) के रूप में माने जाते हैं। इनसे पूर्व का वाÄमय )षि द्रष्ट होने के कारण वैदिक वाÄमय है। काव्य अथवा लौकिक संस्Ñत एवं उसके साहित्य के जनक होने के कारण वाल्मीकि ही आदि कवि स्वीÑत हुए हैं।
संस्Ñत साहित्य में सर्वप्रधन काव्य निर्मित होने के कारण वेद एवं उनके अंग (वेदांग) सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हैं।
पिफर भी 'आदिकवि यह उपनाम केवल वाल्मीकि से इतना अधिक सम्ब( एवं एकरूप है कि बहुत समय से यह वाल्मीकि के विशेषण के रूप में ही प्रयुक्त नहीं हुआ अपितु वाल्मीकि का सम्बोध्न इसी नाम से होने लगा है। 'आदिकाव्य यह नाम वाल्मीकि की स्वयं अपनी खोज है क्योंकि रामायण में वे अपने काव्य को 'आदिकाव्य के नाम से सम्बोधित करते हैं। पुनश्च, जहाँ वैदिक )षि ध्र्म के व्यवस्थापन एवं प्रचार के लिए वाणी का प्रयोग करते हैं, वहाँ लौकिक संस्Ñत काल में कवियों ने उसी ध्र्म के तत्त्व का त्याग न करते हुए जनसमाज के आस्वादन के योग्य भी बनाया। इस सम्बन्ध् में यह अवश्य कहा जा सकता है कि यह परिवर्तन वाल्मीकि के द्वारा ही आविष्Ñत किया गया।
अनादि रामकथानक की अनेक गाथाओं के समिमश्रण को पूर्वापर सम्बन्ध्युक्त आदिकाव्य का स्वरूप प्रदान करने का श्रेय तो वाल्मीकि को है ही प्राचीन सूत्राों की गेय सामग्री वाल्मीकि के हाथों एक अदभूत रचनात्मक परिणाम को प्राप्त करती है। वाल्मीकि को काव्य रचना करने की यह प्रेरणा कैसे हुर्इ इस विषय में एक कथा प्रसि( है-
''एक बार वाल्मीकि किसी वन में नदी के तट पर भ्रमण कर रहे थे, उस समय उन्होंने क्रौंच पक्षियों के एक युगल को घास पर अठखेलियाँ एवं मध्ुर कूजन करते देखा। अचानक वहाँ एक दुष्ट निषाद (बहेलिया) आया और उसने देखते ही देखते क्रौंचयुगल में से नरपक्षी को अपनो बाण से मार गिराया। उस समय जबकि वह पक्षी खुन से लथपथ हो रहा था और स्त्राी पक्षी विरह वेदना से करुणक्रन्दन कर रही थी तब वाल्मीकि एक प्रगाढ़ करुणा के परिद्रवित हो गये और उस बहेलिये
के प्रति क्रोधित होकर शापयुक्त वचन कहे।1 ये शापवचन वाल्मीकि की वाणी से अपने आप 'श्लोक छन्द में ही निकले। तदनन्तर भगवान ब्रह्रा आदि कवि वाल्मीकि से रामचरित का वर्णन करने के लिए अनुरोध् करते हैं।
नीचे पादसूची में उ(ृत इस श्लोक में ही अन्य परवर्ती कवियों ने वाल्मीकि को आदि कवि मानने के औचित्य को ढूंढ़ निकाला है। आदि कवि वह नाम तो इसलिए है कि यह सचमुच एक नयी दिशा की ही खोज थी 'शोक: श्लोकत्वमागत: यह कथन इस बात को सूचित करता है कि वाल्मीकि ने ही सर्वप्रथम इस तथ्य की गवेषण की कि 'वास्तविक कविता कवि के âदय का वह आकसिमक प्रवाह है जो निसां क्रन्दन को देखकर परिद्रवित होने पर उदभुत होती है। वाल्मीकि का कथन है कि उपयर्ुक्त शब्द वीणा के तारों की संगति में गाये जा सकते हैं।
1 मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम शाश्वती: समा:।
यत्क्रौंचमिथुनादकेमषध्ी: काममोहितम।।

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