प्रजातंत्र / लोकतंत्र का अर्थ व परिभाषा

लोकतंत्र के अर्थ पर सर्वाधिक मतभेद है। इसकी अनेक परिभाषाएं व व्याख्याएं की गई हैं। इसको आडम्बरमय कहने से लेकर सर्वोत्कृष्ट तक कहा गया है। सारटोरी तो यहां तक कहने में नहीं हिचकिचाए हैं कि “लोकतंत्र को ऐसी वस्तु के आडम्बरमय नाम के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है

Posted 3 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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लोकतंत्र के अर्थ पर सर्वाधिक मतभेद है। इसकी अनेक परिभाषाएं व व्याख्याएं की गई हैं। इसको आडम्बरमय कहने से लेकर सर्वोत्कृष्ट तक कहा गया है। सारटोरी तो यहां तक कहने में नहीं हिचकिचाए हैं कि “लोकतंत्र को ऐसी वस्तु के आडम्बरमय नाम के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है।” अत: लोकतंत्र के अर्थ व परिभाषा पर सामान्य सहमति का प्रयास करना निरर्थक होगा। वर्तमान में हर शासन व्यवस्था को लोकतान्त्रिक कहा जाता है। यहां तक कि एक बार हिटलर ने लोकतान्त्रिक शासन की बात कहते हुए अपने शासन को ‘जर्मन लोकतंत्र‘ कहना पसन्द किया था। आज प्रजातंत्र के नाम कों इतना पवित्र बना दिया गया है कि कोई भी अपने आपको अलोकतांत्रिक कहने का दुस्साहस नहीं कर सकता। मोटे तौर पर लोकतंत्र शासन का वह प्रकार होता है, जिसमें राज्य के शासन की शक्ति किसी विशेष वर्ग अथवा वर्गो में निहित न होकर सम्पूर्ण समाज के सदस्यों में निहित होती है। डायसी ने लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है, जिसमें प्रभुत्व शक्ति समष्टि रूप में जनता के हाथ में रहती है, जिसमें जनता शासन सम्बन्धी मामले पर अपना अन्तिम नियंत्रण रखती है तथा यह निर्धारित करती है कि राज्य में किस प्रकार का शासन-सूत्र स्थापित किया जाए। राज्य के प्रकार के रूप में लोकतंत्र शासन की ही एक विधि नहीं है, अपितु वह सरकार की नियुक्ति करने, उस पर नियंत्रण रखने तथा इसे अपदस्थ करने की विधि भी है।”

अगर अब्राहम लिंकन की परिभाषा को लें तो “लोकतंत्र शासन वह शासन है जिसमें शासन जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा हो।” इन परिभाषाओं को अस्वीकार करते हुए कुछ विचारक लोकतंत्र को शासन तक ही सीमित न रखकर इसे व्यापक अर्थ में देखने की बात कहते हैं।

गिडिंग्स का कहना है कि “प्रजातंत्र केवल सरकार का ही रूप नहीं है वरन राज्य और समाज का रूप अथवा इन तीनों का मिश्रण भी है।” मैक्सी ने इसे और भी व्यापक अर्थ में लेते हुए लिखा है कि “बीसवीं सदी में प्रजातंत्र से तात्पर्य एक राजनीतिक नियम, शासन की विधि व समाज के ढांचे से ही नहीं है, वरन यह जीवन के उस मार्ग की खोज है जिसमें मनुष्यों की स्वतंत्र और ऐच्छिक बुद्धि के आधार पर उनमें अनुरूपता और एकीकरण लाया जा सके।” डा0 बेनीप्रसाद ने तो लोकतंत्र को जीवन का एक ढंग माना है। 

उपर्युक्त अर्थ व परिभाषाओं से लोकतंत्र एक विशद एवं महत्वाकांक्षी विचार लगता है परन्तु उपरोक्त विवेचन से लोकतंत्र का अर्थ स्पष्ट होने के स्थान पर कुछ भ्रांति ही बढ़ी है। लोकतंत्र की अवधारणा या प्रत्यय के रूप में एक अर्थ नहीं है वरन इसके तीन अन्त:सम्बन्धित अर्थ किये जाते हैं। यह अर्थ हैं- (क) यह निर्णय करने की विधि है, (ख) यह निर्णय लेने के सिद्धान्तों का समूह या सेट है, और (ग) यह आदश्र्ाी मूल्यों का समूह है।

इनका तात्पर्य है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र को निर्देशित करने वाले मूल्यों व निर्णय लेने की प्रक्रिया का मोटा उद्देश्य वर्तमान के आदर्शमय नैतिकता के अन्तर्गत ही समस्त सार्वजनिक कार्यो का दिन-प्रतिदिन सम्पादन हो। हर राजनीतिक समाज में अंतिम गन्तव्यों का निर्धारण करना होता है। यह गन्तव्य क्या हों? इन गन्तव्यों का निर्धारण कौन और किस प्रकार करें? हर राजनीतिक समाज के सामने मौलिक प्रश्न यही होते हैं। इन्हीं गन्तव्यों के अन्तिम उद्देश्यों को समाज के आदर्शो का नाम दिया जाता है। हर समाज में इन आदर्शो की रक्षा व प्राप्ति के लिए संरचनात्मक व्यवस्थाएं रहती हैं। यह लोकतंत्रों में ही नहीं, तानाशाही व्यवस्था में भी रहती हैं। परन्तु इन संरचनात्मक व्यवस्थाओं से सम्बन्धित प्रक्रियाएं लोकतंत्र में और प्रकार की तथा तानाशाही व्यवस्था में और प्रकार की होती हैं। अगर सम्पूर्ण समाज के लिए किए जाने वाले निर्णयों को लेने के सिद्धान्त और विधियां ऐसी हों जिसमें सम्पूर्ण समाज सहभागी रहें तो वह राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक कही जाती है, परन्तु अगर एक ही व्यक्ति या व्यक्ति-समूह सम्पूर्ण समाज के लिए निर्णय लेता है तो वह व्यवस्था तानाशाही मानी जाती है। अत: लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पक्ष निर्णय लेने का ढंग या तरीका है।

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