दिल्ली के लाल किले का इतिहास | 

शाह जहाँ ने 1638 में जब अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया तभी लाल किले का निर्माण करवाया।

Posted 2 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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शाह जहाँ ने 1638 में जब अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया तभी लाल किले का निर्माण करवाया। वास्तविक रूप से देखा जाये तो सफ़ेद और लाल शाह जहाँ के पसंदीदा रंग है, लाल किले को आर्किटेक्ट उस्ताद अहमद लाहौरी ने ही डिजाईन किया था, और उन्होंने ने ही ताज महल का भी निर्माण किया था। यह किला यमुना नदी के पास ही बना हुआ है, और इसी वजह से लाल किले की दीवारे और भी मनमोहक नज़र आती है। लाल किले का निर्माणकार्य 13 मई 1638 को शुरू हुआ था। और शाह जहाँ के नियंत्रण में इसका निर्माण कार्य 1648 में पूरा हुआ। दुसरे मुगल किलो की तरह ही इस किले की सीमा पर बनी दीवारे भी सलीमगढ़ किले की तरह असममित ढंग से बनी हुई है। उस समय मनमोहक लाल किला बनने की वजह से दिल्ली को शाहजहानाबाद कहा जाता था। शाह जहाँ के शासन काल में लाल किला उनके शासनकाल की रचनात्मकता का प्रतिक माना जाता था। शाह जहाँ के बाद उनके उत्तराधिकारी औरंगजेब ने कृत्रिम मोतियों से बनी मस्जिद का भी निर्माण करवाया था, साथ ही औरंगजेब ने प्रवेश द्वार को और भी मनमोहक बनाने के लिये काफी कुछ बदलाव किये। मुगल साम्राज्यों द्वारा किये गये किलो के निर्माण का औरंगजेबने काफी पतन किया और 18 वी शताब्दी में मुगल शासनकाल में बने किलो और महलो को काफी क्षति भी पहोची। 1712 में जब जहंदर शाह ने लाल किले को हथिया लिया था तब तक़रीबन 30 सालो तक लाल किला बिना शासक के था। लेकिन शासनकाल के लागु होने के एक साल पहले ही शाह जहाँ की हत्या हो गयी और उनकी जगह फर्रुख्सियर ने ले ली। अपने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरने के लिये चाँदी की छत को कॉपर की छत में बदला गया। 1719 में लाल किले को रंगीला के नाम से प्रसिद्ध मुहम्मद शाह ने अपनी कलाकृतियों से सजाया। 1739 में पर्शियन शासक नादिर शाह ने आसानी से मुगल सेना को परास्त किया। बाद में नादिर शाह तीन महीने बाद पर्शिया वापिस आये, लेकिन जाने से पहले उन्होंने मुगल शहरो को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। इस तरह से मुगल शासको के आंतरिक रूप से कमजोर होने के कारण ही शाहजहानाबाद का नाम दिल्ली पड़ा और 1752 में उन्होंने मराठाओ के साथ दिल्ली की सुरक्षा का समझौता कर लिया। 1758 में मराठाओ ने लाहौर पर विजय हासिल की और पेशवा भी अहमद शाह दुर्रानी से संघर्ष करते नज़र आ रहे थे। 1760 में मराठाओ ने राजस्व बढ़ाने के लिये दीवान-ए-खास की चाँदी की छत को हटा दिया, क्योकि अहमद शाह दुर्रानी की सेना को परास्त करने के लिये उन्हें भारी राजस्व की जरुरत थी। 1761 में जब मराठा पानीपत की तीसरी लढाई में हार गए थे तब अहमद शाह दुर्रानी ने दिल्ली पर छापा मारा। 10 साल बाद शाह आलम ने मराठाओ की सहायता से दिल्ली के तख़्त को हासिल कर लिया। 1783 में सिख मिसल करोरिसिंघिया ने बघेल सिंह धालीवाल के साथ मिलकर दिल्ली और लाल किले को हासिल कर लिया। लेकिन बाद में सिख शाह आलम को शासक बनाने के लिये राज़ी हो गये और यह समझौता किया गया की मुगल दिल्ली में सिख गुरुओ के लिये सात गुरुद्वारों का निर्माण करेंगे। 1803 में एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान दिल्ली के युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठा सेना को पराजित किया और लाल किले से मराठाओ के शासन को खत्म किया और ईस्ट इंडिया कंपनी ने लाल किले पर अपना नियंत्रण बनाया। युद्ध के बाद ब्रिटिश ने लाल किले को अपने अधीन ले लिया और उसे ही अपना निवास स्थान घोषित कर दिया। अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह द्वितीय ने आखिर 1857 की क्रांति के दौरान किले को हासिल कर ही लिया। लेकिन इतनी विशाल मुगल ताकत होने के बावजूद 1857 के समय मुगल ब्रिटिशो के खिलाफ लाल किले को नहीं बचा पाये। ब्रिटिशो के खिलाफ पराजित होने के बाद बहादुर शाह द्वितीय ने 17 सितम्बर को ही लाल किला छोड़ दिया। बाद में वे ब्रिटिशो के कैदी बने लेकिन 1858 में उन्हें जाँचा परखा गया और उसी साल 7 अक्टूबर को उन्हें रंगून भेजा गया। मुगल शासन के खत्म होते ही शासन को ब्रिटिशो ने अपने हातो में ले लिया और मुगलों के सारे किलो को ब्रिटिशो ने हासिल कर लिया था। हासिल करने के बाद ब्रिटिशो ने किलो के फर्नीचर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और साथ ही किले के हरम, क्वार्टर और गार्डन को भी काफी क्षति पहोचाई और उनका भी विनाश किया। मुगलों ने बनाये मार्बल के महल ही केवल ब्रिटिशो के अत्याचार से बचे रहे, इनको छोड़कर बाकी सभी मुगल सामग्री को ब्रिटिशो ने ध्वस्त कर दिया था। और किलो की अमूल्य और कीमती धातुओ को क्षति पहोचाकर उन्हें लूट कर ले गये। देखा जाये तो किलो के 2/3 आंतरिक भाग को ब्रिटिशो ने ध्वस्त कर दिया था और किले में केवल अब मनमोहक दीवारे ही बची हुई है। लेकिन फिर 1899-1905 तक भारत राज करने वाले लार्ड कर्ज़न ने किलो की और किले की दीवारों की मरम्मत कराने का आदेश दिया। और साथ ही उन्होंने किलो में बने गार्डन को भी पानी देने का और उनमे सुधार करने का आदेश दिया। 1747 में नादिर शाह के हमला करने के बाद और 1857 में भारत का ब्रिटिशो के खिलाफ पराजित होने के बाद किले की ज्यादातर कीमती धातुओ को या तो लूट लिया गया था या तो वे चोरी चली गयी थी। कहा जाता है की ब्रिटिश शासको ने उन्हें प्राइवेट समूहों को बेंच दिया था और कुछ कीमती सामानों को ब्रिटिश म्यूजियम ले गये थे। कहा जाता है की आज भी उनके कीमती सामान ब्रिटिश लाइब्रेरी और अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया है। उदाहरण कोहिनूर हीरा, शाह जहाँ का हरे रंग का शराब का कप और बहादुर शाह द्वितीय का ताज लन्दन में रखा गया है। भारतीयों द्वारा की गयी बहोत सिफ़ारिशो को ब्रिटिश सरकार ने कई बार अमान्य किया है। 1911 में ब्रिटिश किंग और क्वीन दिल्ली दरबार को देखने आये थे। उन्हें दीखने के लिये उस समय बहोत से महलो और किलो की मरम्मत भी की गयी थी। इसके बाद लाल किले के आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम को भी ड्रम हाउस से मुमताज़ महल में स्थानांतरित किया गया।

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