यमुना / विष्णु प्रभाकर

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत है। इसकी एक चोटी का नाम बन्दरपुच्छ है। यह चोटी उत्तरप्रदेश के टिहरी-गढ़वाल जिले में है। बड़ी ऊंची है, २०, ७०० फुट।

Posted 4 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत है। इसकी एक चोटी का नाम बन्दरपुच्छ है। यह चोटी उत्तरप्रदेश के टिहरी-गढ़वाल जिले में है। बड़ी ऊंची है, २०, ७०० फुट। इसे सुमेरु भी कहते हैं। इसके एक भाग का नाम कलिंद है। यहीं से यमुना निकलती है। इसीसे यमुना का नाम कलिंदजा और कालिंदी भी है। दोनों का मतलब कलिंद की बेटी होता है। यह जगह बहुत सुन्दर है, पर यहां पहुंचना बहुत कठिन है। स्वामी रामतीर्थ वहां पहुंचे थे। बस बर्फ की पहाड़ी दीवार पर चढ़ना था, पैर फिसला और सीधे यमपुर। पर चढ़ ही गये। आगे खूब घना वन आया। अन्धेरा इतना कि पेड़ की डाल भी न सूझे। उसके बाद वे खुले मैदान में पहुंचे। वहां हवा में मीठी सुवास थी। जमीन फिसलनी, चारों ओर हरियाली की भरमार। मनोहर फूलों के छोटे-छोटे पौधे। सब थकान उतर गई। जैसे नया जीवन मिला।फूलों के इसी प्रदेश के पास एक हिमानी से यमुना जन्म लेती है, फिर ८ कि.मी. नीचे उतरकर घाटी में आती है। इस घाटी का नाम 'जमनोत्री' की घाटी' है। इस घाटी में खड़े होकर देखो, दो पतली धाराएं पहाड़ से उतरती दिखाईदेती हैं, जैसे चांदी के झरने हों। नीचे दोनों मिल जाती हैं और यमुना कहलाती हैं। इस घाटी की ऊंचाई १०, ८०० फुट है। यहां यमुनाजी का एक छोटा सा मंदिर है। गरम पानी के कई सोते है। एक तो इतना गरम है कि उसमें आलू उबल जाते हैं। हर साल गर्मियों में हजारों यात्री यहां आते हैं, गरम कुंड में नहाते हैं और यमुना मैया की जन्मभूमि के दर्शन करते हैं>यह घटी मनोरम नहीं है। दोपहर बाद कोहरा छा जाता है। ६ महीने बर्फ जमी रहती है। गरम कुंड में नहाते हैं और यमुना मैया की जन्मभूमि के दर्शन करते हैं। यह घटी मनोरम नहीं है। दोपहर बाद कोहरा छा जाता है। ६ महीने बर्फ जमी रहती है। यमुना नदी का नाम वेदों में आता है, पुराणों में आता है। रामायण, महाभारत में भी आता है। कहते हैं, यमुनामैया सूरज की बेटी है।इसके भाई यमराज हैं। इसलिए इनका एक नाम 'यमी' भी है। सूरज की बेटी होने के कारण 'सूर्य-तनया' कहलाती हैं। इसका पानी बहुत साफ पर कुछ नीला, कुछ सांवला है, इसलिए इन्हें 'काला गंगा' और 'असित' भी कहते हैं। असित एक ऋषि थे। सबसे पहले यमुनामैया की जन्मभूमि का पता इन्होंने ही लगाया था। शायद इसीलिए यमुना का एक नाम 'असित' पड़ गया है। अब बन्दरपुच्छ के नाम की कहानी सुनिये। रामचन्द्रजी लंका को जीतकर अयोध्या लौट आये। राज करने लगे। हनुमानजी बहुत थक गये थे। थकान उतारने के लिए वह सुमेरु पर पहुंचे।यहां से कोई ४० कि.मी. नीचे एक जगह है 'गंगानी'। यहां नीले रंगवाली यमुना ऐसी लगती हैं जैसे कोई पहाड़ी युवती हो। चेचल, पर बलवती। ऊंचे-नीचे मार्गो पर भागती जा रही हैं, किसी से मिलने। पर यमुना के देश में यह 'गंगानी' नाम कैसा? इसकी भी एक कहानी है। पुराने जमाने में यहां एक ऋषि रहते थे। गंगा यहां से कुल २५ कि.मी. दूर है। पर एक विकट पहाड़ पार करना होता है। वह ऋषि उस राढ़ी पर्वत को पार करके रोज गंगा नहाने जाते थे। एक दिन वह बूढ़े हुए। तब उनसे चला नहीं गया। उन्होंने 'गंगामैया' को पुकारा। मैया प्रसन्न हुई और यमुना के किनारे एक कुंड में आकर रहने लगीं। वह कुंड आज भी है। ऐसा लगता है किसी साहसी ने गंगा की एक धारा को इधर मोड़ दिया था। शायद उन ऋषि ने ही कोई जुगत की हो।

बहुत दूर तक यमुना इसी तरह उछलती-कूदती चलती है। छोटे-मोटे बहुत से झरने, बहुत सी नदियां इसमें मिलती हैं। इसी तरह सिरमौर की सीमा के पास देहरादून की घाटी में पहुंच जाती है। यहां कालसी-हरिपुर के पास इनकी बहन टौंस (तमसा) इससे मिलने आती है। यह संगम बड़ा पावन माना जाता है।'हयहय' क्षत्रिय पुराने जमाने में बड़े मशहूर हुए। कार्तवीर्यार्जुन जैसा वीर इसी जाति में हुआ था। इसी का नाम सहस्रार्जुन था, परशुराम ने इसी को मारा था। इस जाति का आदि-पुरुष 'हयहय' यहीं पैदा हुआ था। कुछ लोग मानते हैं कि चन्द्रवंश के राजा पुरुरवा की राजधानी यहीं कहीं थी। वह एक पहाड़ी नरेश था और यहीं उर्वशी उनसे मिली थी। उनके पोते ययाति ने नीचे उतरकर मैदान में अपना राज फैलाया। इन्हीं के कुल में आगे चलकर श्रीकृष्ण, कौरव और पाण्डव हुए और पहाड़ों में पहले किन्नर, सिद्ध, गन्धर्व आदि जातियां रहती थीं। ये लोग बहुत खूबसूरत और नाचने-गाने के शौकीन थे। उर्वशी इन्हीं में से किसी जाति की रही होगी।

कुछ दूर शिवालिक पहाड़ियों में घूम-घामकर यमुना नदी पहाड़ों से विदा लेती है। अपना पीहर छोड़ देती है और फैजाबाद (जिला सहारनपुर) के स्थान पर मैदानों में प्रवेश करती है। बस, यहीं से यह उपकार में लग जाती है। सिंचाई करने को लोग नदियों से नहर निकालते है। जिन नदियों से हमने पहले-पहल नहर निकाली, उनमें यमुना भी है। ६०० साल पहले दिल्ली में फिरोज तुगलक राज करता था। उसने फैजाबाद के पास से यमुना नदी से एक नहर निकाली थी। आज इस नहर का नाम 'पच्छिमी यमुना नहर' है। यह अम्बाला, हिसार और करनाल आदि जिलों को सीचाती है। लेकिन यह नहर शुरु से ही ऐसी नहीं थी। कुछ दिन बाद ही बुंद हो गई थी। २०० साल बाद अकबर ने इसे पुर ठीक करवाया। उसे हांसी-हिसार के शिकारगाहों के लिए पानी की जरुरत थी। शाहजहां उसकी एक शाखा दिल्ली तक ले गया। ५० साल बाद यह नहर फिर खराब हो गई। लार्ड हेस्टिंग्ज के समय में कप्तान व्लेन ने उसे फिर चालू किया। यह १८१८ ई० की बात है। तबसे इसे बहुत बार ठीक किया गया, क्योंकि यह दुधारु गाय है। आज जो इसका रुप है, उसके लिए बहुत पैसा खर्च हुआ। एक तरह से इसे नये सिरे से बनाया गया

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