6जिनके क्रांतिकारी विचार आज भी जोश भरते हैंi

महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी हम सभी के लिए प्रेरणा है, वहीं उनकी मौत अब तक का सबसे बड़ा रहस्‍य। 23 जनवरी को नेताजी की जयंती है। साल 1897 में इसी दिन ओडिशा के कटक में उनका जन्‍म हुआ था। साल 1921 में प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर देश की आजादी के समर में कूदने वाले सुभा

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Raj Singh
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महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी हम सभी के लिए प्रेरणा है, वहीं उनकी मौत अब तक का सबसे बड़ा रहस्‍य। 23 जनवरी को नेताजी की जयंती है। साल 1897 में इसी दिन ओडिशा के कटक में उनका जन्‍म हुआ था। साल 1921 में प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर देश की आजादी के समर में कूदने वाले सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचार आज भी हम सभी में जोश भरते हैं। नेताजी ने आजादी की लड़ाई के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया था। उन्‍होंने हिंदुस्‍तान की आजादी के लिए पूरे यूरोप में अलख जगा दी थी। उनसे जुड़ी ऐसी कई बातें हैं, जिनसे हम आज भी अनजान हैं।हमारे देश की ही एक बड़ी आबादी का मानना है कि नेताजी की मौत नहीं हुई है। आरोप तत्‍कालीन भारत सरकार पर भी लगे कि सत्ता में बैठे लोग यह जानते थे कि नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई। लेकिन जनता से सच्‍चाई छुपाई गई। इसके पीछे तर्क यह भी दिया जाता है कि बोस राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी के विरोधी थे। ऐसे में कांग्रेस उन्‍हें नापसंद करती थी।नेताजी से जुड़े लोग और किस्‍सों से पता चलता है कि उन्‍हें कारों का बहुत शौक था। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी कोई कार नहीं खरीदी। नेताजी के पौत्र चंद्र कुमार बोस ने इस बात का खुलासा किया। उन्होंने कहा, ‘यह बात सही है कि नेताजी कारों के शौकीन थे। लेकिन जहां तक मुझे पता है नेताजी ने कभी कोई कार नहीं खरीदी थी।’चंद्र कुमार बोस कहते हैं कि नेताजी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी गतिविधियों में इस कदर व्यस्त रहते थे कि उनके पास खुद के लिए समय नहीं था। बताया जाता है कि नेताजी के बड़े भाई शरत बोस जो कार खरीदते थे, नेताजी उन्हीं में सवारी करते थे। शरत बोस भी कारों के शौकीन थे। उनके पास उस दौर में विलिज नाइट और फोर्ड समेत छह-सात कारें थीं। ऑडी की वांडरर डब्ल्यू-24 भी उनमें से एक थी।नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जब एल्गिन रोड स्थित घर में नजरबंद किया गया था, तब वह ऑडी की इसी कार में अंग्रेजों को चकमा देकर निकले थे। इस घटना को इतिहास के पन्‍नों में ‘द ग्रेट एस्केप’ के नाम से भी जाना जाता है। नेताजी के भतीजे डॉ. शिशिर बोस तब उस कार को ड्राइव कर रहे थे। वह कार से गोमो (तब बिहार में, अब झारखंड) गए थे। 18 जनवरी 1941 को इस कार से नेताजी शिशिर के साथ गोमो रेलवे स्टेशन पहुंचे और फिर वहां से कालका मेल पकड़कर दिल्ली आ गए थे।नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई में सहायता के लिए साल 1942 में हिटलर से भी मिले थे। लेकिन हिटलर ने भारत को आजाद करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सुभाष चंद्र बोस ने देश के नौजवानों से आजाद हिंद फौज में भर्ती होने के लिए बड़े स्‍तर पर आह्वान किया था। उनका यह नारा आज भी देश की फिजाओं में गूंजता है- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।

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