मीराबाई का जीवन परिचय

मीराबाई कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। उनकी कविताओं में स्त्री पराधीनता के प्रति एक गहरी टीस है, जो भक्ति के रंग में रंगकर और गहरी हो गयी है

Posted 6 months ago in Other.

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Dipika Solanki
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मीराबाई कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। उनकी कविताओं में स्त्री पराधीनता के प्रति एक गहरी टीस है, जो भक्ति के रंग में रंगकर और गहरी हो गयी है। मीरा बाई ने कृष्ण-भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है। जीवन परिचय कृष्णभक्त और श्रद्धा से भरी रचना के लिए आज भी मीराबाई का नाम आदर से लिया जाता है। मीराबाई बहुत बड़ी कृष्ण भक्त संत कवयित्री थी। मीराबाई ने खुद के जीवन में बहुत दुख सहा था। इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुंवर भोजराज के साथ हुआ था, जो उदयपुर के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, किन्तु मीरा इसके लिए तैयार नही हुईं। वे संसार की ओर से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। राजघराने में जन्म और विवाह होकर भी मीराबाई को बहुत दुख झेलना पड़ा। इस वजह से उनमे विरक्तवृत्ती बढ़ती गयी और वो कृष्णभक्ति के तरफ खिची चली गयी। उनका कृष्णप्रेम बहुत तीव्र होता गया। मीराबाई पर अनेक भक्ति संप्रदाय का प्रभाव था।  इसका चित्रण उनकी रचनाओं में दिखता है। ‘पदावली’ ये मीराबाई की एकमात्र, प्रमाणभूत काव्यकृती है, ‘पायो जी मैंने रामरतन धन पायो’ ये मीराबाई की प्रसिद्ध रचना है, ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ ऐसा वो खुद का उल्लेख करती है।  साहित्यिक देन मीराबाई के भाषाशैली में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। पंजाबी, खड़ीबोली, पुरबी इन भाषा का भी मिश्रण दिखता है। मीराबाई की  रचनाएं बहुत भावपूर्ण है। उनके दुखों का प्रतिबिंब कुछ पदों में गहराई से दिखता है। गुरु का गौरव, भगवान की तारीफ, आत्मसर्मपण ऐसे विषय भी पदों में है। पूरे भारत में मीराबाई और उनके पद ज्ञात है। मराठी में भी उनके पदों का अनुवाद हुआ है। उनके जन्मकाल के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है फिर भी मध्यकालीन युग में हुई भारत की श्रेष्ठ संत कवयित्री आज भी आदर की पात्र हैं। 

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