मानव नेत्र की जानकारी

मानव नेत्र शरीर का वह अंग है जो विभिन्न उद्देश्यों से प्रकाश के प्रति क्रिया करता है। आँख वह इंद्रिय है जिसकी सहायता से देखते हैं। मानव नेत्र लगभग १ करोड़ रंगों में अन्तर कर सकता है।

नेत्र शरीर की प्रमुख ज्ञानेंद्रिय हैं जिससे रूप-रंग का दर्शन होता है। मनुष्य के दो नेत्र होते हैं।

Posted 3 months ago in Other.

User Image
Dipika Solanki
290 Friends
1 Views
3 Unique Visitors
मानव नेत्र शरीर का वह अंग है जो विभिन्न उद्देश्यों से प्रकाश के प्रति क्रिया करता है। आँख वह इंद्रिय है जिसकी सहायता से देखते हैं। मानव नेत्र लगभग १ करोड़ रंगों में अन्तर कर सकता है।

नेत्र शरीर की प्रमुख ज्ञानेंद्रिय हैं जिससे रूप-रंग का दर्शन होता है। मनुष्य के दो नेत्र होते हैं।

रचनासंपादित करें

प्रत्येक नेत्र 2.5 सेंटीमीटर व्यास का गोलाकार पिंड होता है। यह कपाल के नेत्रगर्त में स्थित होता है और उसका छोटा सा भाग ही बाहर से दिखाई पड़ता है। इस भाग को अग्रखंड कहते हैं। इस खंड का मध्य भाग कॉर्निया है, जो पारदर्शक होता है।

नेत्रगोलक की तीन परतें होती हैं। बाहरी परत (श्वेत पटल) घने संयोजक तंतुओं की होती हैं, जो अंदर की परतों की रक्षा और नेत्रपेशियों की कंडराओं के संन्निवेश को सुविधा प्रदान करती है। इस पटल का अग्रभाग पारदर्शक कॉर्निया है और बाकी हिस्सा श्वेत अपारदर्शी होता है। आँख में कंजंक्टाइवा नामक श्लेष्मिक झिल्ला के पीछे से इसी की सफेदी झलकती है। मध्य परत है श्यामवर्ण रंजित पटल। इसके दो भाग होते हैं : पश्च दो तिहाई, कोरायड, जो केवल रक्तवाहिनियों का जाल होता है और अग्र तिहाई, अपेक्षाकृत स्थूल भाग, जिसे रोमक पिंड (सिलियरी बॉडी) कहते हैं। यह वृत्ताकार पिंड आगे की और आइरिस या परितारिका पट्ट बनाता है। आइरिस के बीच एक छिद्र होता है, जिसे प्यूपिल या नेत्रतारा कहते हैं। यह छोटा बड़ा हो सकता है तथा इसी में से प्रकाश नेत्र के पश्चखंड में प्रवेश करता है। भीतरी परत, तंत्रिका के रेशों और कोशिकाओं से निर्मित, दृष्टिपटल होती है।

इन परतों के आलावा रोमक पिंड से निलंबन स्नायु द्वारा संलग्न ठीक आइरिस के पीछे लेंस अवस्थित होता है। कॉर्निया और लेंस के अग्रपृष्ठ के बीच का स्थान अग्रकक्ष और आइरिस तथा लेंस के बीच का पतला वृत्ताकार स्थान पश्चकक्ष कहलाता है। इन पक्षों में पतला जलीय द्रव नेत्रीद होता है। लेंस के पश्च भाग में क्रिस्टलीय पारदर्शी श्लिषि (जेल) होती हैं, जिसे सांद्र द्रव कहते हैं।

रोमक पिंड के तीन भाग होते हैं :

(1) रोमक मुद्रिका - रंजित पटल का अग्रभाग, जिसमें अरीय ढंग से स्थापित मेड़ें होती हैं;

(2) रोमक प्रवर्ध - लेंस परिसर के चारों ओर झालर की भांति स्थित होता है;

(3) रोमक पेशी - ये अरेखित पेशियाँ होती हैं तथा अरीय और वृत्तीय ढंग से स्थित होती हैं। दूरदृष्टिवालों में ये पेशियाँ काफी विकसित होती हैं।

आइरिस में भी दो प्रकार की पेशियाँ होती हैं, वृत्तीय और अरीय। वृत्तीय के आकुंचन से प्यूपिल छोटा होता है और अरीय के सिकुड़ने से फैलता है। ये स्वचालित पेशियाँ हैं और सहजक्रिया-केंद्र द्वारा इनका नियंत्रण होता है।

नेत्रोद का निर्माण संभवत: रोमक प्रवर्ध की कोशिकाओं से प्राप्त स्फाटकल्पयुक्त तरल के अपोहन से होता है। इसमें प्लाज़्मा के समानुपात में स्फाटकल्प होते हैं और पर्याप्त मात्रा में ह्यालयुरोनिक अम्ल भी होता है। नेत्रोद के कारण नेत्र के अंदर का चाप 18 से 25 मिमी. (पारद) होता है। नेत्रोद पश्च कक्ष से निकलकर अग्रकक्ष में और यहाँ से फांटाना के प्रदेश में आता है। यहाँ श्लेम की नाल और प्रदेश के बीच केवल अंत:कला का झीना अंतरपट होता है और नेत्रोद इसी पथ से नेत्र शिरा में जा गिरता है। प्रति मिनट 2 घन मिमी. नेत्रोद बनता है और उसके बाहर निकलने में कहीं बाधा आई तो नेत्र का चाप बढ़ जाता है। इस दशा को 'ग्लॉकोमा' या समलबाई कहते हैं। ऐसे नेत्र छूने पर पत्थर से कड़े प्रतीत होते हैं।

More Related Blogs

Back To Top