modee sarakaar ke phaisale ko badala

supreem kort ne pahale kaaryakaal mein 2 baar modee sarakaar ke phaisale ko badala

Posted 2 months ago in News and Politics.

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Raj Singh
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कर्नाटक का सियासी नाटक खत्म होने का नाम नहीं ले रहा,

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में कर्नाटक के

रूप में पहली बार किसी राज्य सरकार के खिलाफ धारा 356

इस्तेमाल किए जाने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि

मोदी सरकार के लिए धारा 356 के इस्तेमाल का अनुभव

सकारात्मक नहीं रहा है. कर्नाटक सरकार के भविष्य पर

फैसला करने से पहले मोदी सरकार अपने पिछले अनुभव पर

भी विचार करेगी.

'दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंककर पीता है', मोदी सरकार

2.0 को पिछले कार्यकाल का अनुभव यही सीख देता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में केंद्र सरकार ने

2014 से 2019 के बीच 2 बार धारा 356 का इस्तेमाल कर

राज्य सरकार को बर्खास्त करने की कोशिश की थी, लेकिन

उसे देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने जोर का

झटका दिया और उसकी काफी किरकिरी हुई थी.

अब विधानसभा स्पीकर ने सदन की कार्यवाही सोमवार तक

के लिए स्थगित कर दी है. अब फ्लोर टेस्ट पर वोटिंग सोमवार

को ही संभव है.

बर्खास्तगी की पहली कोशिश नाकाम

मोदी राज में चुनी हुई राज्य सरकार को धारा 356 के तहत

बर्खास्त करने की शुरुआत पूर्वोत्तर के राज्य अरुणाचल प्रदेश

से हुई. घटनाक्रम की शुरुआत राज्य सरकार के अंदर मची

उथल-पुथल से हुई. दिसंबर 2014 में जब मुख्यमंत्री नबाम तुकी ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री कालिखो पुल को

मंत्रिमंडल से हटा दिया. इसके बाद से वहां की राजनीतिक

गरमा गई. राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस और बीजेपी ने बागी गुटों

के साथ मिलकर जमकर जोर आजमाइश की.

बढ़ते विवादों के बीच 16 दिसंबर, 2015 को नबाम तुकी

सरकार ने विधानसभा भवन पर ताला जड़ दिया. समय से पहले आयोजित विधानसभा सत्र की बैठक दूसरे भवन में

कराई गई. बैठक में 33 विधायकों ने हिस्सा लिया जिसमें विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया को विधानसभा अध्यक्ष के

पद से हटाने का प्रस्ताव पारित हुआ और नया अध्यक्ष नियुक्त कर लिया गया.

जवाब में 17 दिसंबर, 2015 को सामुदायिक सभा उपलब्ध

नहीं होने के कारण बागी विधायकों ने होटल में ही विधानसभा सत्र बुला लिया और मुख्यमंत्री नबाम तुकी के खिलाफ मतदान

किया. फिर कालिखो पुल को मुख्यमंत्री बनाया गया. जनवरी 2016 को मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिसने केस को संविधान

पीठ को सौंप दिया.



इस बीच, 26 जनवरी को मोदी मंत्रिमंडल ने राज्य में राष्ट्रपति

शासन लगाने की सिफारिश कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश के संबंध में

राज्यपाल की रिपोर्ट मांगी. 11 फरवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल विधानसभा स्पीकर की शक्तियां

नहीं छीन सकता. फिर कोर्ट ने विधानसभा में शक्ति परीक्षण

की याचिका खारिज कर दी. 19 फरवरी को राज्य में राष्ट्रपति

शासन समाप्त हो गया. कालिखो पुल फिर से मुख्यमंत्री बन

गए.

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